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मार्च, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोहन हैं जहाँ प्रेम है वहाँ…

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  धर्म ग्रंथो में ये वर्णित है कि पृथ्वी पर जब जब पाप कि उत्पति हुई है तब तब उसके उन्मूलन के लिए अदृश्य शक्तियों ने धरा पर अवतार लिया है।श्री कृष्ण भी अवतारी पुरुष थे।धार्मिक ग्रंथो में इस बात का विस्तृत उल्लेख मिलता है कि श्री कृष्ण भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार स्वरुप थे।उन्होंने पृथ्वी पर बढ़ रहे अर्धम व पाप के विनाश के लिए ही श्री कृष्ण के रुप में अवतार लिया था। भादों माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन देवकी की आठवीं संतान के रुप में जन्में श्री कृष्ण का लालन पालन गोकुल गांव में नंद यशोदा के घर हुआ। यद्यपि श्री कृष्ण कोई साधारण पुरुष नहीं थे।ईश्वर स्वरुप होकर व हर प्रकार से सक्षम होकर भी उन्होंने हमेशा स्वंय को विन्रम ही बनाए रखा।उन्होंने आमजन को जहाँ धर्म का पाठ पढ़ाया वहीं जनमानस को कर्म का महत्व समझाकर उनसे निरंतर कर्मशील बने रहने का आवाह्न किया।उन जैसा कर्मयोगी न तो उनसे पहले कभी हुआ और न ही उनके बाद।गीता में श्री कृष्ण ने कर्म को ही प्रमुख बताया है।उन्होनें गीता में कहा भी है कि- कर्मण्येवाधिकारस्ते : मा फलेषु कदाचन:॥ अर्थात कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन उसके फल प...

ग्रहण…

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  दिल्ली आए तो मुझे बरसों हो आए थे मगर फिर भी मैं इस शहर के लोगों के बीच रच-बस नहीं पाया था। बरसों यहां ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद भी यह शहर मेरे लिए पराया का पराया ही था। अपना तो यहां कोई दूर-दूर तक भी दिखाई नहीं देता था। यहां रहने वाला हरेक शख्स मेरे लिए अज़नबी ही था। बस इन लोगों की भीड़ के बीच कोई अपना-सा लगता था तो वह थी पल्लवी जो मेरे बगल वाले मकान में ही रहा करती थी। बस चार साल पुरानी ही तो बात है जब पल्लवी अपने बाबा के साथ यहां रहने आयी थी। इतने साल पास में रहते हुए भी कभी उन लोगों से ढंग से बात तक नहीं हो पाई थी। मगर हां पल्लवी के बाबा से कभी-कभार दुआ-सलाम ज़रूर हो जाया करती थी हालांकि पल्लवी से कभी बात नहीं हो पाई थी। एकदम शांत-सी दिखने वाली पल्लवी को देखकर कभी-कभी लगता था मानो उसे दुनिया से कोई मतलब ही न हो। न ही उसका किसी से लेना-देना था। उसकी तो अपनी ही एक अलग दुनिया थी जिसमें वह खुश थी या दुखी इसके बारे में कोई नहीं जानता था। बरसों से उससे मिलने यहां कोई नहीं आया था और न ही पल्लवी ही किसी से मिलने गई थी। उसका रास्ता तय था बस घर से सीधा ऑफिस और ऑफिस से सीधा घर। बीच में उसक...

सब लोग बुरे नहीं होते…

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  बात कुछ साल पहले की है।मैं चंडीगढ़ जाने के लिए दिल्ली बाईपास पर खड़ा बस की प्रतीक्षा कर रहा था।वहां काफी देर खड़ा रहने के  बाद भी मुझे चंडीगढ जाने वाली बस नहीं मिली थी।घने कोहरे के कारण वहां हाथ दो हाथ की दूरी भी मुश्किल से दिखाई दे रही थी।ऊपर से सुबह की कड़कड़ाती ठंड ने मुझे ठिकुरने पर मजबूर कर दिया था।दृश्यता शून्य होने के कारण वहां सभी गाड़ियां सड़क पर रेंगकर चल रही थी।वहां खड़ा हर शक्स अपने गन्तव्य स्थल पर जल्दी पहुंचना चाहता था।बस न मिलने की टीस वहां खड़े प्रत्येक यात्री के मुख पर स्पष्ट देखी जा सकती थी।बस स्टॉप के पास ही चाय के स्टाल पर एक बड़े से पतीले में चाय ख़ौल रही थी।टी-स्टाल पर खड़े कुछ यात्री कड़कड़ाती ठंड में चाय की चुस्कियां लेकर शरीर को गर्माहट देने का प्रयास कर रहे थे। बस की प्रतीक्षा में लोग बार -बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ियां देख रहे थे।पता नहीं क्यों आज सार्वजनिक वाहन रोड से नदारद थे।काफी इंतज़ार के बाद एक कार तीव्रता से हमारे पास आकर रुकी।गाड़ी के रुकते ही भीड़ ने उसे बंदरों के झुंड की तरह चारों तरफ से घेर लिया।तब कार चालक को स्वयं कार से नीचे उतरकर आना पड़ा।उसने यात...

परिंदों के आशियाने……..

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  परिंदों के आशियाने…….. बैंक में आज आम दिनों की भांति कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। वैसे भी आज शनिवार का दिन तो था ही, और फिर शनिवार को तो बैंक का लेनदेन भी दोपहर तक ही सिमट जाता है। बिरजू भी काफी देर से लाइन में लगा हुआ था। मगर लाइन थी जो टस से मस ही नहीं हो रही थी। शायद ! खजांची बाबू के कंप्यूटर में ही कुछ गड़बड़ थी। तभी तो लाइन रुकी खड़ी थी। एक पुराना-सा कपड़े का झोला जिसमें कई सिलवटें पड़ी हुई थीं, उसे कई बार मोड़कर बिरजू ने अपनी बगल में दबा रखा था। शायद ! इसे पैसे रखने के लिए ही वो अपने साथ लाया था? अचानक से लाइन में कुछ हलचल-सी हुई और लाइन में खड़े लोग चीटियों की कतार की भांति आगे सरकने लगे। शायद ! खजांची बाबू का कंप्यूटर ठीक हो गया था। इसीलिए उन्होंने भी जल्दी-जल्दी लाइन में खड़े लोगों को  निपटाना शुरू कर दिया था। बिरजू भी धीरे-धीरे कम हो रही लोगों की पंक्ति में अपनी बारी की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था। मगर पीछे से बार-बार हो रही धक्का-मुक्की देखकर उसकी रूह तक कांप रही थी। जरा-सी धक्का-मुक्की शुरू होते ही उसके हाथों की जकड़न बगल में दबे उस खाली झोले पर अनायास ही बढ़ जाती थ...

जादूगर.....

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                                                                                                                                                          जादूगर …. हमारे कॉलेज के बिलकुल सामने थी चन्दर की चाय की दुकान। बस पूरा दिन कॉलेज के लड़के - लड़कियों का जमावड़ा लगा रहता था वहाँ। आखिर ! लगा भी क्यों न हो ? चाय के साथ प्यार जो मिलता था वहाँ । एक अपनेपन का अहसास जिसे आधुनिकता के इस द...