मोहन हैं जहाँ प्रेम है वहाँ…
धर्म ग्रंथो में ये वर्णित है कि पृथ्वी पर जब जब पाप कि उत्पति हुई है तब तब उसके उन्मूलन के लिए अदृश्य शक्तियों ने धरा पर अवतार लिया है।श्री कृष्ण भी अवतारी पुरुष थे।धार्मिक ग्रंथो में इस बात का विस्तृत उल्लेख मिलता है कि श्री कृष्ण भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार स्वरुप थे।उन्होंने पृथ्वी पर बढ़ रहे अर्धम व पाप के विनाश के लिए ही श्री कृष्ण के रुप में अवतार लिया था। भादों माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन देवकी की आठवीं संतान के रुप में जन्में श्री कृष्ण का लालन पालन गोकुल गांव में नंद यशोदा के घर हुआ। यद्यपि श्री कृष्ण कोई साधारण पुरुष नहीं थे।ईश्वर स्वरुप होकर व हर प्रकार से सक्षम होकर भी उन्होंने हमेशा स्वंय को विन्रम ही बनाए रखा।उन्होंने आमजन को जहाँ धर्म का पाठ पढ़ाया वहीं जनमानस को कर्म का महत्व समझाकर उनसे निरंतर कर्मशील बने रहने का आवाह्न किया।उन जैसा कर्मयोगी न तो उनसे पहले कभी हुआ और न ही उनके बाद।गीता में श्री कृष्ण ने कर्म को ही प्रमुख बताया है।उन्होनें गीता में कहा भी है कि- कर्मण्येवाधिकारस्ते : मा फलेषु कदाचन:॥ अर्थात कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन उसके फल प...