जादूगर.....

 

                                                                                                                                                       जादूगर….

हमारे कॉलेज के बिलकुल सामने थी चन्दर की चाय की दुकान। बस पूरा दिन कॉलेज के लड़के-लड़कियों का जमावड़ा लगा रहता था वहाँ। आखिर! लगा भी क्यों हो?चाय के साथ प्यार जो मिलता था वहाँ एक अपनेपन का अहसास जिसे आधुनिकता के इस दौर में लोगों ने बिल्कुल ही भुला रखा था। चन्दर कॉलेज के लड़के-लड़कियों में "जादू"के नाम से मशहूर था। जादू की चाय में जो बात होती थी वो कहीं  और मिलनी मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी थी। उसकी दुकान के बाहर आठ-दस बेंच रखे थे। जहाँ सारा दिन कॉलेज के लड़के-लड़कियों का जमघट लगा रहता था। जब जादू अपनी मासूम-सी हंसी के साथ चाय पेश करता तो बस तबीयत हरी हो जाती थी। जादू सभी को अपने परिवार की तरह मानता था। कभी पैसे तो किसी से मांगे ही नहीं उसने। किसी ने दे दिए तो सही और ना दिए तो सही। परन्तु उसका चाय पिलाने का क्रम यूँ ही अनवरत चलता रहता। जादू अपना सब कुछ इस तरह लूटा रहा था-मानों नदियाँ अपना सर्वस्व सागर पर अर्पण कर देती हैं। मगर जिस असीम आनंद की प्राप्ति उसे कॉलेज के बच्चों के साथ रहकर होती थी वैसी तृप्ति तो लाखों-करोड़ों खर्च करके भी नहीं पाई जा सकती।

 

जादू अपने परिवार के साथ कॉलेज के पास बनी झुग्गियों में ही रहता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी,एक लड़की और एक छोटा- सा लड़का था। दूसरी तरफ हमारी परीक्षाएँ भी सिर पर चुकी थी। इसलिए हम हॉस्टल में रहकर ही पढ़ाई में मशगूल रहते थे। परीक्षा की चिंता में हम सबकी जान आफ़त में फंसी हुई थी। परीक्षा के तनाव के कारण हम जादू की दुकान पर चाय पीने भी कम ही जा पाते थे। मगर जब भी जाते तब जादू चाय बनाते हुए कहता था "बाबू जी- चिंता की कोनो बात नहीं है। मन लगाकर पढ़ाई करो आप परीक्षा में जरूर पास हो जाओगे" और फिर वह उसी दिलकश हंसी के साथ हमारी चाय  टेबल पर रख देता चाय की चुस्कियों से तरो- ताज़ा हो कर हम फिर से परीक्षा की तैयारी में जुट जाते थे।


धीरे-धीरे परीक्षा का बोझ भी हमारे सिर से उतर चुका था। कुछ दिनों बाद जब परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो मेरे लिए आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही बात ही कुछ ऐसी थी आखिर! पूरे कॉलेज में टॉप किया था मैंने। हम सब दोस्त इस खुशी को सांझा करने के लिए जादू की दुकान पर पार्टी करने पहुँच गए।



 जब जादू ने मेरी कॉलेज टॉप करने की बात सुनी तो मुझसे कहीं ज्यादा खुशी शायद! उसे ही हुई। उसकी आँखों से खुशी के आँसू निकल आए थे। उसे रोता देखकर मैं भी सकपका- सा गया था। मैंने तुरंत अपनी हंसी को नियंत्रित करते हुए उससे पूछा-"अरे!जादू तुम रो क्यों रहे हो"? मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर आत्मीयता से पूछा था। उसने रुंधे गले से उत्तर दिया-"कुछ नहीं बाबू जी। बस यूँ ही आँखों से आँसू छलक आये थे" उसने अपने गले में पड़े मैले से मफ़लर से  आंसू पोंछते हुए कहा-"बाबू जी यहाँ से जाने कितने ही बच्चे अफ़सर बनकर चले गए। देखते ही देखते  कब यहाँ पच्चीस वर्ष बीत गए पता ही नहीं चला" बात करते-करते वह फिर भावुक हो गया था। उसकी आँखों से फिर आँसू बहने लगे। जब मैं उसे दिलासा देने लगा तो उसने मुझे गले से लगकर बधाई दी। मुझे लगा जैसे-मेरा कोई अपना ही मुझे प्यार से आशीर्वाद दे रहा है। मैं भी कुछ समय के लिए भावनाओं में बहकर भावुक हो गया था।

 

चाय पार्टी खत्म होने के बाद  जब मैं उसे पैसे देने लगा तो उसने वह पैसे वापस मेरी जेब में डाल दिए। वह फिर अपनी आँखें पोंछते हुए कहने लगा -"बाबू जी क्या आपकी खुशी हमारी खुशी नहीं है"? क्या आप हमारे कुछ नहीं लगते? मैंने उसे पुनः पैसे देने की कोशिश की मगर जादू ने फिर से पैसे वापिस मेरी जेब में रख दिए। उसने एक बार फिर मुझे गले लगकर बधाई दी। हम सब लोग उल्लास के साथ हॉस्टल में लौट आए। कुछ दिनों के संघर्ष के बाद  मेरी भी दूसरे शहर में बैंक मैनेजर की नौकरी लग गई थी। परंतु यहाँ रहकर भी मैं जादू की चाय का स्वाद नहीं भूला पाया था। व्यस्तता दिन --दिन मुझपर हावी होती जा रही थी। व्यस्त जीवनशैली के कारण अब तो कभी-कभार ही अपने शहर जाना हो पाता था। मुझे अब भी याद कि जब पिछली बार मैं शहर गया था तो मुझे मालूम पड़ा था कि जादू की माली हालत काफी खराब हो चुकी है। इस वजह से उसे अपनी चाय की दुकान भी बेचनी पड़ी थी। उसका परिवार दाने-दाने के लिए मोहताज़ हो चुका था। ये सुनकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं सीधा ही उसके घर जा पहुँचा। मुझे देखते ही जादू की आँखें भर आई परंतु वो अपने हालात जाहिर नहीं करना चाहता था वह चेहरे पर वहीं जादुई मुस्कान लाकर बोला- "कैसे हो बाबू जी? शहर से कब आए? उसने एक साथ कई सवाल दाग दिए थे। मगर उसकी हंसी आज जाने क्यों मुझे बनावटी-सी लगी मैं मौन खड़ा चुपचाप उसकी आँखों में छिपे दर्द को पढ़ने की कोशिश में लगा था। मैं तो उसकी व्यथा जानता था। मगर वो था कि जाहिर ही नहीं करना चाहता था। मैंने हमदर्दी से उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसकी आँखें भरभरा आई। उसकी हालत देखकर मेरी आँखें भी सजल हो आई थी। मैंने तुरंत अपना रुमाल निकालकर अपनी आँखें साफ की। अंतस के शब्दकोश से कुछ शब्द टटोलकर मैंने जादू से बात करनी शुरू की।-"मैं सब कुछ जानता हूँ जादू" मेरी बात सुनकर उसकी आँखों से फिर सावन-भादों की अविरल धारा फूट पड़ी। मैंने बिना देर किए तुरंत जेब से दस हजार रूपये निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा दिए। मैंने उसके हाथ में पैसे थमाते हुए कहा-"जादू तुम ये पैसे रख लो और फिर से अपनी दुकान शुरू करो" मेरी बात सुनते ही उसकी आँखों से फिर आँसू छलक आए थे। उसकी आँखों में आँसू ऐसे चमक रहे थे जैसे -सुबह सूरज की रोशनी में ओस की बूंदें चमक उठती हैं। जादू पैसे मेरी तरफ बढ़ाते हुए हाथ जोड़कर विनती करने लगा-" -"बाबू जी मैं ये रूपये नहीं ले पाऊंगा" वह पैसे मुझे जबरदस्ती वापिस देने की कोशिश करने लगा। मैंने बड़ी मुश्किल से वो पैसे उसके हाथ में दोबारा थमा दिए। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा-"जादू क्या तुम मुझे अब अपना नहीं समझते? मेरी बात सुनकर उसने रोते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया उसने रुंधे गले से कहा -"नहीं बाबूजी ये बात नहीं है। मगर.....और बोलते-बोलते शब्द अचानक से उसके हलक में ठहर गए। भावनाओं के हृदय में उठते ज्वार से उसका कंठ अवरुद्ध हो चुका था मैंने हमदर्दी के साथ उसे सांत्वना दी। जादू-"अब तुम ये अगर-मगर छोड़ो मुझे नौकरी पर भी जाना है" मैंने अपनी बात खत्म करते हुए उसके हाथों में रखे पैसों पर अपना हाथ कसकर रखते हुए कहा था मैं तुरंत उसके सुखद भविष्य की कामना करके  जल्दी से उसके घर से  बाहर निकल आया उसके घर से बाहर आकर भी मैं काफी देर तक भावनाओं की गिरफ़्त में जकड़ा रहा। मैं शहर जाने वाली बस में अपनी सीट पर बैठ चुका था। थोड़ी ही देर में बस धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी मस्तिष्क में यादों का चित्रांकन नियमित रूप से चल रहा था बस की तेज रफ़्तार में कहीं पीछे छूट गया था जादू और उसका घर। खैर!यादों की गिरफ़्त से बाहर आना भी जरूरी था मैंने जेब से अपना मोबाइल निकालकर कुछ फिल्मी गीत सुनना शुरू कर दिया था ताकि मन हल्का हो जाए दो घंटे के सफ़र के बाद बस शहर पहुँच चुकी थी मैं बस से अपना सामान उतारकर जल्दी ही अपने ठिकाने पर पहुँच गया।  दोबारा शहर आकर मैं फिर से अपने काम में रम चुका था। कभी-कभी स्मृतियां फिर खींच ले जाती थी मुझे अपने शहर। जहाँ मेरा घर था -जादू था और मेरे ढेर सारे दोस्त थे कई महीने हो आए थे, अबकी बार मुझे  अपने शहर गए फिर भी यादें तो मुझे अक़्सर खींच ही ले जाती थी अपने शहर एक दिन जब मैं कार्यालय में बैठा अपने दैनिक कार्य निपटा रहा था, तब किसी परिचित ने मुझे फोन पर सूचना  दी कि जादू को कैंसर हो गया है। ये खबर सुनकर में स्तब्ध रह गया। मैंने अविलंब कार्यालय से छुट्टी लेकर  एक बैग में अपने कुछ कपड़े डाले और निकल पड़ा जादू से मिलने। मन में जादू से मिलने की उत्सुकता बढ़ चुकी थी।यात्रा के सफर में मेरी स्मृतियों में बस उसकी जादुई मुस्कान और चाय का स्वाद ही तैरता रहा जब मैं उसके घर पहुँचा तो पता चला कि जादू अस्पताल में भर्ती है

 



 बस फिर उसके घर से मैं ऑटो पकड़कर सीधा अस्पताल जा पहुँचा मैंने डॉक्टर को अपना परिचय बता कर बात की।

 



डॉक्टर ने मुझे बताया कि जादू को बल्ड कैंसर है। डॉक्टर की बात  सुनते ही मेरे बदन की सारी शक्ति क्षीण हो गई। मैं समझ नहीं पा रहा था कि जिसकी चाय की मिठास हजारों लोगों के रक्त में दौड़ रही है आखिर! उसे रक्त कैंसर कैसे हो सकता है? अभी मैं विचारों के जंजाल से बाहर निकला भी नहीं था कि एक नर्स ने आकर डॉक्टर को जादू को मौत की खबर दी। आज इस गुमनाम जादूगर की ज़िंदगी का आखिरी शो भी खत्म हो चुका था। मोहब्बत का एक जादूगर और लोगों में प्यार बांटने वाला फरिश्ता हमसे हमेशा के लिए दूर जा चुका था।

 

 

-नसीब सभ्रवाल "अक्की"

गांव-बांध,तहसील-इसराना,

                                                         पानीपत-132107 (हरियाणा)

मो..-9716000302, 8053607536



                           


 

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