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हम बस दोस्त रहेंगे…

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मार्च की वह एक धीमी, उदास और थोड़ी थकी हुई-सी शाम थी, जैसे- दिन ने बिना कुछ कहे ही हार मान ली हो। अस्तलगामी सूर्य की आख़िरी किरणें स्टेशन की पटरियों पर बिखरकर धीरे-धीरे धरती से विदा ले रही थीं। मैं स्टेशन पर लोगों की भीड़ के बीच में खड़ा होकर भी अपने भीतर एक अजीब-सी खालीपन महसूस कर रहा था। प्लेटफॉर्म पर हमेशा की तरह एक हलचल थी—“चाय… गरम चाय…” की आवाजें, समोसे की खुशबू, कुलियों के कंधों पर लदा सामान, और भागते हुए लोग। ऐसे लोग, जिनके पास रुकने का समय नहीं था। मैं यूँ ही प्लेटफॉर्म पर टहलते-टहलते एक इलेक्ट्रिक पोल के पास आकर रुक गया।मेरे बगल में ही एक चाय का स्टॉल था जहां एक बड़े से भगोंने में चाय खोल रही थी।कुछ यात्री वहां चाय का लुफ़्त उठा रहे थे।वहां खड़े -खड़े मेरे मन में आया —“कहीं पहुंचने के लिए कहीं से निकलना जरूरी होता है…”आज ऑफिस में मन नहीं लग रहा था तो मैं आज घर जाने के लिए वहां से जल्दी निकल आया था। खैर! मैं ख्यालों की उधेड़बुन में खोया ही था कि तभी स्टेशन पर ट्रेन के आने की घोषणा हुई। ट्रेन आने की घोषणा होते ही स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर रही भीड़ अचानक से बेचैन हो उठी।जो ल...