कृष्णगाथा.…..


                                                                                                                                       कृष्णगाथा.........


बंगाल की गलियां गूंज रही हैं। महामंत्र के अनंत आह्लाद से गूंज रही हैं। चैतन्य नाच रहे हैं। अकेले नहीं, साथ में पूरा जंगल नाच रहा है। मृदंग, झांझ, मंजीरे हर वाद्य पर वहीं नाम, वहीं रट... राजस्थान में दरस दीवानी बनकर मीरा डोल रही है। महलों के ठाठ-बाट छोड़ सांवलिया वैद को खोज रही है गली-गली। तमिल में आलवार और अंडाल, कन्नड़ में अक्क और माधवाचार्य, नरसी गुजराती में, विद्यापति मैथली में, जयदेव संस्कृत में, शांगदास डोगरी में और ब्रजभाषा में अष्टछाप के कवि गा रहे हैं। उसी के गीत, उसी की तान, उसी के राग और हरिदास... सखी भाव से वे भी तो झूम रहे हैं उसी एक के आकर्षण में। संगीत फूट रहा है। तानपूरा पुलक से बज रहा है। अकबर हैरान है, आखिर दो वस्त्र लपेटे बैठा ये संत किसके ऐश्वर्य में डूबा है! ये कौन-सी मस्ती है, जो राजा को न मिली फकीर को मिल गई? आखिर ये कौन-सा भोग है, जो सारे योगों से परे है? भला क्या है, जो पा लिया है इसने। भला क्या है, जो भर गया है। भला क्या है, जो बह रहा है इतने प्रेम के साथ। इतने सौंदर्य के साथ। इतने सुख के साथ... कोई अनुभूति, कोई आनंद, कोई उत्सव, कोई सत्य। वह और कोई नहीं है, कृष्ण है! कृष्ण साहब हमारा है...



चुपचाप बह रही है प्रीत की नदी यमुना और राधा खोई है बनती-मिटती लहरों के खेल में। शुभ्रा कभी यमुना को देखती, कभी राधा को। एक नदी और एक स्त्री, लेकिन दोनों बिल्कुल एक जैसी । भीतर-भीतर कितने तूफान, कितनी गहराई, लेकिन ऊपर कोई हलचल नहीं... कोई आंदोलन नहीं... बस बहना, बहते जाना... लहरों के साथ, हवाओं के साथ, बहाव के साथ...! शुभ्रा ने मां से कहा... 'मां, नदी कभी कुछ बोलती क्यों नहीं... सबकुछ क्यों समेटे रखती है अपने भीतर?'

ये कैसा सवाल है, राधा चौंक पड़ी... 'शुभ्रा ! नदी की शांति ही स्वीकार्य है, क्योंकि चुप रहने वाली नदी जब बोलती है तो दूर-दूर तक सन्नाटा बिखेर देती है। यूं बरसात का संबल पाकर कभी-कभी उफनती भी है नदी, लेकिन बरसात के जाते ही फिर सिमट जाती है किनारों में। किनारों की मर्यादा निभानी ही पड़ती

है नदी को...।' 

'और अगर न निभाए तो...!!.?

'नहीं शुभ्रा... किनारों के भीतर ही तो है नदी का सुख और नदी का सृजन। किनारों के पार विध्वंस है। नदी का धर्म विध्वंस नहीं, सृजन है और स्त्री का भी...।'

शुभ्रा ने मां की आंखों में देखा। कितनी बार देखी हैं ये भीगी आंखें। वहीं जानती है, सबको जोड़ने के लिए बूंदों में कितना टूटती रही है ये नदी... नदी जैसी ये मां...! शुभ्रा ने उठकर मटकी जल में डुबोई तो हलचल से यमुना कांप गई। शुभ्रा का चेहरा जैसे राधा का बरसों पुराना आईना बन गया। हाथ में फूटी मटकी लिए अपना ही प्रतिबिंब देख रही है सर से पांव तक भीगी हुई राधा... सुधियां...। जाग पड़े सुधि भीने क्षण...

'बड़ा निर्लज्ज है रे तू...'

'निर्लज्ज... लज्जा तो स्त्री का आभूषण है राधे! मैं तो निर्लज्ज ही भला...!' 'जाके कहूंगी न तेरी मां से, तब देखूंगी कि कितना हंसता है... पता भी है, कितने जतन से बेलबूटे काढ़े थे मैंने मटकी पर...

सब मिट्टी में मिला दिए तूने।'

'मिट्टी को तो एक दिन मिट्टी में मिलना ही है राधे। मिट्टी से क्या मोह करना'।

'चल-चल... अपने ज्ञान की मटकी किसी और पर फोड़ना। मुझे तो बस मेरी मटकी लौटा दे, वैसी की वैसी... और हां, बेलबूटे भी बनवा लूंगी तुझसे।'

'बेलबूटे तो मुझसे न बनेंगे राधे रानी। मैं तो बस इसका चित्र बना सकता हूं... मंजूर हो तो बोल दे...।'

'वाह रे चित्रकार! और कुछ नहीं मिला तुझे इस बांस के टुकड़े के सिवाय? तू तो यही चाहता है ना कि सब सखियां मुझ पर हंसें।'

'ये बांस का टुकड़ा नहीं राधे, बांसुरी है। प्राणों से जब फूंकी जाती है तो सृजन का गीत मुखर होता है...।'

राधा सुनती रह गई। सृजन का गीत... प्राणों से दी गई फूंक... बांस का टुकड़ा नहीं, बांसुरी... यह क्या हुआ ! एक मधुर ध्वनि बिखरने लगी हवा में। गजब का कर्षण। गजब का खिंचाव। गजब का सम्मोहन। राधा जानती है। भला बांस का टुकड़ा भी कहीं ऐसा जादू रच सकता है। ये जादू तो इसी सांवरे का है। वही तो है, जो सबको खींच रहा है। सबको बांध रहा है। इससे कोई छूटे भी तो कैसे...! इतना 'कर्षण' अन्यत्र है भी कहां...?

नाद के स्वागत के साथ, संगीत के सत्कार के साथ, उत्सव की घोषणा के साथ 'ज्यौं भावै त्यौं उड़ाय लै जाय आपने रस...' वो ऐसा ही है! ध्रुपद-धमार, कान्हरो, बरारी, कल्याण, बिलावल, विभास, गोरी, टोड़ी... उस एक के लिए सोलह हजार राग और रागनियों का उत्सव भी कम ! हरिदास, बिहारिनदास, नागरीदास, बैजू बावरा, तानसेन, नायक बख्शू... उसका कर्षण दुनिया भर का गीत बनकर गूंज रहा है। भाषाओं को लांघ रहा है। सीमाओं को तोड़ रहा है। वन-पर्वत, नदी-झरने, कदंब-करील, द्वार- दीवार - सब बहे जा रहे हैं। उसका गीत सबको बहाए ले जा रहा है। कण-कण, डाल-डाल, पात-पात, सब कान बन जाना चाहते हैं। ब्रह्मा विमोहित हैं। विष्णु मगन हैं। शिव का ध्यान टूट रहा है। यह टूटना भी तो जुड़ने जैसा है। सब जड़-चेतन इस जुड़ाव के धागे में गुंथ रहे हैं। लोक से, वाणी से, शब्द से, भूमि से और भाव से इतना जुड़ाव और कहां है! इस जुड़ाव में रस है। इस जुड़ाव में रास है। रस अलौकिक... रास अलौकिक... और राग भी अलौकिक। वो सांवरा परे है सबसे, हर राग और विराग से... फिर भी लिपटता है और लपेटता है हर राग में। जीवन की अमृत धार के बीच वो शरत चांदनी-सा छिटका है।

कौन है वो?

'कृष्ण... कृष्ण... कृष्ण...!'

'कृष्ण? कौन कृष्ण? यहां तो सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण हैं। 'जित देखौ तित श्याम' रजत सौंदर्य से मंडित ये रात्रि कृष्ण, इस रात्रि के वक्ष पर घिरे ये मेघ भी कृष्ण... ये कालिंदी भी कृष्ण। और तो और ये कदंब, ये करील और ये तमाल... ये सबके सब कृष्ण ही तो हैं!'

'अरे नहीं! इस सृष्टि में वर्णनीय और दर्शनीय एक ही कृष्ण हैं सबसे सुंदर, सबसे मधुर। राधा के कृष्ण...! माधुर्य की अमृत - झंकार, जो हृदय से बरबस फूटती है कभी ओंकार बनकर, कभी ह्रींकार बनकर, और कभी गोविंद और गोपाल बनकर...

कृष्ण मधुर हैं। मधुरतम हैं, इसीलिए उनका व्यक्तित्व अनूठा - है। यदि इस अनूठेपन का, इस मधुरता का, इस आनंद का साक्षात्कार चाहें तो यहां आइए इस वंदनीय ब्रज वसुंधरा पर... प्रेम रस से पगी धन्य धरा ! कृष्ण की आनंद भूमि, आह्लाद भूमि, लीला भूमि... ब्रजभूमि! यहां आकर तो स्वयं मुक्ति भी मुक्त  मुक्त होना चाहती है -

मुक्ति कहै गोपाल सौ मेरी मुक्ति बताय। 

ब्रज रज उड़ि मस्तक लगे मुक्ति मुक्त हुई जाय।।

कुरुक्षेत्र में कितना ही दर्शन कहा हो कृष्ण ने, लेकिन जिसने भी उनकी ब्रजभूमि पर पांव रखा, उनकी इस भूमि का दर्शन - किया, वहीं झूमने लगा तन्मय होकर। यही झूम तो है ब्रज का अनोखा रंग। झूमती हुई धरा। झुलाती हुई धरा। सावन के हिंडोले और झूलों का असली रंग यहीं आकर पाया जा सकता है। नेह के इसी हिंडोले पर झूलते हुए ही तो कृष्ण ने एक वचन दिया था राधा को... प्रेम के महीने में दिया गया प्रेम जैसा शाश्वत एक वचन...।

सावन का तीसरा दिन था वो... राधा ने धानी रंग पहना था। हाथों में हरी-हरी मेहंदी... कलाइयों में हरी-हरी चूड़ियां... राधा जैसे धरती हो गई थी। सावन हो गई थी। कृष्ण बरबस कह उठे, ....राधे ! मैं जहां भी रहूं, कभी तुमसे विलग नहीं होऊंगा... तभी तो दुनियाभर में, जहां भी देखिए राधा-कृष्ण हैं। कहीं भी रुक्मिणी-कृष्ण या सत्यभामा-कृष्ण नहीं मिलते।

द्वारिका की माटी में वो झूम कहां, जो रुक्मिणी या सत्यभामा के भाग्य में ऐसा अनुपम वचन लिख पाती ! यह झूम तो ब्रज में है। ब्रजरज में है। इसी झूम में झूम-झूम कर सब अपनी तरह बखान करते हैं इसे। वेद कहते हैं - 'व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रजः' – गौचारण की स्थली ही ब्रज है। अष्टछाप के कवि कहते हैं कि गौ सेवा की भूमि है ब्रज। ऋग्वेद, यजुर्वेद, शुक्लयजुर्वेद, वैदिक संहिताएं, रामायण, महाभारत, हरिवंश और भागवत जैसे अनेकानेक ग्रंथ सब एकजुट होकर कहते हैं कि 'ब्रज' है गोशाला, गोचर-भूमि या गोप बस्ती। महर्षि शाण्डिल्य कह रहे हैं, वो, जो भरा है सत, रज और तम से, वही व्यापक है, वही ब्रह्म है, वहीं ब्रज है।

कृष्ण के साथ-साथ व्यापक होती गई ब्रज की परिधि। विस्तार समेटता गया ब्रज का अर्थ । कृष्ण जन्मे मथुरा में, लेकिन जन्म लेते ही भेज दिया गया यमुना पार की इसी गोप-बस्ती में। इसी भूमि पर हुआ लीलाओं का खेल। अपने रस से सींचकर इसी स्नेहिल भूमि ने पाला कृष्ण को। कृष्ण के लोकरंजक रूप को। अपने विशाल आंचल में इसने समेट कर रख लिया कृष्ण की लीलाओं का अमृत। महारास के पीयूष को पीकर सदा-सदा के लिए तृप्त-परितृप्त हो उठी ये भूमि।

ब्रजभूमि मोहिनी मैं जानी,

मोहन कुंज मोहन वृंदावन मोहन जमुना पानी

 मोहिनी नारि सकल गोकुल की बोलत अमृत वानी 

श्री भट्ट के प्रभु मोहन, मोहिनी राधा रानी...     

 ब्रज राधा का हृदय है। राधा का हृदय कंस की भूमि को नहीं समेटता अपने आंचल में। आज भले कृष्णलीला का पूरा क्षेत्र ही ब्रज कह दिया जाता हो, लेकिन 'मथुरा', 'मधुपुरी' या 'मधुवन', 'ब्रज' की परिधि में कभी थे ही नहीं। भागवत में, सूरदास के यहां, ब्रजभाषा के अनेकानेक कवियों के यहां मथुरा नहीं, मथुरा के पास बसा वन्य प्रदेश और उसकी गोप-बस्ती है ब्रज। सघन वन संपदा के ऐश्वर्य में डूबी सुगंधित निकुंजों की भूमि। पग-पग पर महाप्रयाग रचते चरण, करोड़ों कल्पवृक्षों का दर्प नाश करने वाले वन-उपवन। कोयलों, भ्रमरों और मयूरों का समवेत गान... यही था ब्रजधाम, कृष्ण का प्राण...।

भागवत में, जो 'ब्रज' बहुत छोटा-सा ग्राम था, 16वीं शताब्दी तक आते-आते वही 'ब्रज' 'ब्रजमंडल' हो गया। देखते ही देखते 84 कोस में फैल गया। कृष्ण उपासक संप्रदायों, ब्रजभाषा कवियों और भक्तों के भाव का रस जहां-जहां तक गया, वहां-वहां तक मानो ब्रज के बीज जा छिटके। सूरदास ने कहा, जो सुख ब्रज में एक घरी, सो सुख तीन लोक में नाहीं, इसी सुख की अनुभूति में लिपटकर रसखान ने कामना की

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं संग गोकुल गांव के ग्वालन।

 जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।

 पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयौ कर छत्र पुरंदर धारन।

 जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिंदी-कूल-कदंब की डारन।।

जो भाव ब्रज से जुड़ा, उसने ब्रज को 'स्थान' न रहने दिया, 'अनुभूति' बना दिया। ब्रज बाहर नहीं है, भीतर है। जो चेतना है, चैतन्य है, जो बोध की छिपी हुई सत्ता है, जो आलोक है, वही है ब्रज। ब्रज... मन के भीतर बहती हुई सतत धारा है। जीवन के आनंद की। जीवन के आह्लाद की। जीवन के माधुर्य और प्रेम की। इस धारा का अनुभव करना कृष्ण का अनुभव करना है। कृष्ण का अनुभव ब्रज के बिना अधूरा है। कृष्ण ब्रज का आधार हैं, लेकिन ब्रज के बगैर अधूरे हैं। कैसा आश्चर्य है! छीतस्वामी रंगे हैं श्याम के रंग में पर 'अचरा' पसार-पसार मांगते हैं ब्रज को। क्यों... क्योंकि जहां ब्रज है, वहीं कृष्ण हैं।

अहो विधिना तोसों अचरा पसार मांगू

 जनम जनम दीजों मोहे याहि ब्रज बसिबों!

ब्रज रस का देश है 'जहां काल व्यापै नहीं...'। युग-युगांतर बीते पर रस का प्रथम क्षण न कभी रीता। न कभी बीता। रस की अनुभूति को काल कभी बूढ़ा नहीं कर सका। इतनी सामर्थ्य कहां है काल में कि ब्रज को बुढ़ा दे। ब्रज के भाव को बुढ़ा दे। असम, उड़ीसा, बंगाल, तमिलनाडु, कश्मीर, मणिपुर, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान... कृष्ण कितनी संस्कृतियों को खींचकर डाल देते हैं, ब्रज के आंचल में। वृंदावन का श्रीरंगनाथ मंदिर कृष्ण की भूमि पर तमिलनाडु की विष्णु कथा का अनुवाद है। यहां विराजे हैं वरदराज, जिन्होंने भागवत का तमिल में अनुवाद किया था। कृष्ण भाव से मुग्ध ताजबीबी यहां आकर कह उठती हैं, 'नंद के कुंवर बलिहारी तारी सूरत पै। हौ तौ मुगलानी हिंदुवानी है रहोंगी मैं...' और पूरा बंगाल एक मुख होकर कहता है, 'कानु छांडा गीत गाई, धान वीना खेत नाई...' कान्हा को छोड़कर गीत नहीं, धान बिना खेत नहीं।बंसी की टेर, कालिंदी का कलरव और कदंब... कृष्ण के ब्रज का यह उन्मुक्त आनंद भाव ही है, जो रोम-रोम छूता है। तभी तो ब्रज की रीतियों में बस जाता है गुजरात के नरसी का गीत और तभी प्रभुपाद की टेर पर थिरक पड़ता है, भौतिक रस में जीता हुआ यूरोप। 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण' की धुन सात समंदर पार भी सांसों की धुन जैसी हो जाती है। वेस्ट वर्जीनिया की पहाड़ी पर बस जाता है वृंदावन !

सूरसेन (शूरसेन), मधुबन, मधुरा, मधुपुरी और मथुरा... आज भी अतीत के सारे अध्याय ब्रजरज में महकते हैं। उन्नति और परिवर्तन की दौड़ में कितना कुछ बदला, लेकिन ब्रज के मूल में आज भी वहीं रस है। वही माधुर्य है। वहीं प्रेम है। इस प्रेम में ठहराव नहीं, सातत्य है। बहाव है। बहाव... बहती हुई यमुना जैसा। यमुना... बहते हुए प्रेम जैसी।

जै जै महारानी जमुना, जै जै पटरानी जमुना 

विश्राम घाट पर आरती के स्वर। लहरों पर रोशनी का खेल... दीपदान की झिलमिल सुगंध। आह्लाद। आनंद। उत्सव। प्रार्थनाओं के मधुर नाद में खोई हुई यमुना। चुनरी मनोरथ को हृदय तक स्वीकारती हुई यमुना। यहां लहरों पर उफान नहीं, शांति है। कभी कंस को मारकर आए कृष्ण ने इसी जगह यमुना के आंचल में खोजी थी, विश्रांति। यमुना कृष्ण की पटरानी हैं। ब्रज की महारानी हैं। यमुना पर मोहित होकर हलधर ने भी पुकारा था एक बार, लेकिन गोरे हलधर का रंग यमुना के मन को छू भी न पाया। छूता भी कैसे, जब यमुना रंगी है, श्याम रंग में। भूल का भान होते ही बलराम द्वारिका चले गए। सागर किनारे और यमुना... उसने सागर में जाने का मोह न किया। रास्ता बदल विसर्जित हो गई गंगा में।

यमुना और कृष्ण का साथ है। बहुत गहरा साथ है। कृष्ण भी काले। यमुना भी काली। अब किसने किसको रंगा, ये कौन बताए ! कृष्ण इसके हृदय पर रास रचाते हैं। सबको भिगोने वाली नदी भीग-भीग उठती है रास के रस से। यूं, यमुना ने साथ न दिया होता तो भला कृष्ण कैसे पहुंचते मणिमय कनक नंद के आंगन तक! कैसे झूलते हरि जसोदा के पालने में। राधा, रुक्मिणी, द्रौपदी... कितनी सखियां । कितनी गोपियां। पर सबसे पहले कृष्ण के साथ है यमुना। भादों की काली अंधियारी रात में सबसे पहले यमुना ने ही छुआ था कृष्ण को। प्रेम की ये नदी कैसे भूल सकती है उन क्षणों को। परम पावन चरणों के शीतल स्पर्श को। उधर, आसमान की काली चुनरिया से रस झर-झर बरस रहा था। इधर, एक बार, बस एक बार पग पखारने को आतुर यमुना का जल प्रवाह ऊंचा और ऊंचा हुआ जाता था ! उर्दू के शायर सागर निजामी यमुना से कहते हैं, 

तेरे साहिल पे कभी आया परेशान वसदेव

 कंस का मारा हुआ माखूर-ओ- कहरा वसदेव। 

कंस के जुल्मों की सख्त हैबत दिल पै थी

 मोरधन पै एक नजर थी और एक साहिल पै थी।

 याद है, अब तलक तेरा तूफां उठाना याद है 

मोरधन को देख के मौजों पे आना याद है।

 किस कदर जादू भरा था शोक-ए-पाबोसी तेरा

 तेरी बेताबी पे आखिर कृष्ण को रहम आ गया। 

कृष्ण ने अपना कदम बहर-ए-रवां पर रख दिया। 

बोसे देकर कृष्ण के कदमों को तू बहने लगी 

माइल-ए-मकसूद-ओ महब-ए-जुम्तज बहने लगी । 

कैसी थी वो रात। ब्रजभूमि के परम सौभाग्य की रात। देवकी के भय और कंस के क्लेश की रात। अमावस, अंधेरा और कारागार। जन्म हुआ आलोक की एक किरण का। किरण जिसने घनघोर अंधेरे को चीरा। क्रूर सत्ता को चुनौती दी। प्रेम का चिरंतन संदेश बनकर जन में रस का संचार किया। समष्टि का भाव जगाया। वे सबसे जुड़े। अंश-अंश, जोड़ते गए सबको। जुड़ने और जोड़ने की यही प्रक्रिया तो थी, कृष्ण के व्यक्ति से विराट होने की प्रक्रिया। कृष्ण कहते हैं, 'दीवारें परे फेंककर सबसे जुड़ो। सबसे प्रेम करो। बूंद से सागर होने का एकमात्र यहीं रहस्य है।' कृष्ण के लिए कोई सखी है। कोई सखा है। सब अपने हैं। कौन है, जो पराया है? इसीलिए सबके हृदय में बसे हैं कृष्ण। घट-घट वासी कहाते हैं। फिर भी दर्शन के लिए दृष्टि चाहिए। हर ओर। हर प्राणी में, हर स्थिति में, हर परिस्थिति में उसे देखने की विराट दृष्टि। जिसके पास यह दृष्टि है, उससे भला वो कैसे छिपा रह सकता है...

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति। 

तस्याहं न प्रणश्यामी सच में न प्रणयश्यति ।।

ज्ञान कभी ऊबकर कहता है कि जीवन बंधन है। इस बंधन में, इस कारागार में उत्सव और मुक्ति की तमाम संभावनाएं उ‌द्घाटित करते हैं कृष्ण। मृत्यु अनेक रूप लेती है। कृष्ण उन सब रूपों को हराते हैं। जीवन जीतने की धुन सिखाते हैं। फिर इसी धुन पर थिरकता है, जीवन। इस थिरकन से पहले कितना कुछ सहना पड़ा था सृष्टि को। धरा ने कैसे-कैसे बिताया था, एक-एक पल।

 वसुदेव ग्रहे साक्षात भगवान पुरुषः परः -

हाहाकार मचा था धरती पर। अरिष्ट, धेनु, केशी, प्रलंब, नारद, सुंद, वाणासुर और कंस जैसे आतताइयों से भयभीत पृथ्वी गौ रूप धरकर सुमेरु पर्वत पर जा पहुंची, 'हे प्रभो रक्षा कीजिए। इन असुरों का भार अब नहीं सहा जाता।' तब भगवान विष्णु ने अपने श्वेत और श्याम दो केश उखाड़कर कहा, 'हे धरती, मेरे ये दो अंश शीघ्र ही अवतार लेकर तुम्हारी पीड़ा का निवारण करेंगे।' श्वेत और श्याम का यह क्या रहस्य था... गोरे बलदाऊ और काले कन्हाई या गोरी राधा और श्यामल श्याम... ब्रज की रज उठाकर देखिए! इसमें आज भी है श्वेत और श्याम कणों का संयोग। तभी तो ब्रज की रज के एक कण के लिए रसखान मोती माणिक सब लुटाने को तत्पर हैं, 'एक ब्रज रेणुका पै चिंतामनि वार डारूं'

ऐसा ही है ब्रज का आकर्षण। मानव ही नहीं, देवों को भी खींचता है। और देव ही नहीं, स्वयं महादेव को भी खींच लेता है। उस दिवस कैलाश पर नाट्याचार्य शिव के कंठ से मुखरित मृदंग का स्वर गूंज रहा था। प्रवीण शिष्या-सी शिवा की मनोहर नृत्य मुद्राएं सुर और सप्तक के साथ क्षण-क्षण बदल रही थीं। शिव प्रसन्न थे। अनायास ही बोल उठे... 'स्नेहशील, प्रेममयी, रस-प्रतिमा... अहा ! कितना शोभन है नारी जन्म! देवी! तुमने मेरी सभी इच्छाओं को पूरा किया है। आज एक अभूतपूर्व कामना जागी है। कृपया उसे भी पूरा करो। महाधन्य ब्रजधाम चलकर तुम मेरे प्रियतम का रूप धरो और मैं तुम्हारी प्राणेश्वरी बनूं...!'

ऐसी अनोखी अभिलाषा ! शिवा दो घड़ी बस हंसती रहीं, 'ठीक है प्रभो, मैं ब्रजभूमि पर जन्म लूंगी कृष्ण बनकर और आप बनेंगे कृष्ण प्रिया राधा। ब्रज में दिव्यामृत रचेगी हमारी लीला। नेति-नेति कह उठेंगी लेखनी। जया और विजया अवतार लेंगी श्रीदामा और सुदामा बनकर। श्री शेष मेरे बड़े भाई होंगे। मैं पृथ्वी को कंस जैसे नराधमों से मुक्त करूंगी। बांसुरी से सृजन के सुर बिखेरूंगी। गीता का उपदेश देकर दिग्भ्रमित मानव को कर्म का अमर संदेश दूंगी...'

फिर क्या था। जन्म लेकर आ गया अजन्मा। धरती की पुलक का ओर-छोर नहीं। ... जसोदा जायौ ललना... ये बात कोई गोपी यमुना पर सुन आई है। फूली-फूली सबसे कहती फिर रही है... 'हौं एक बात्ति सुनी आई !' पुलकित नंद सोना, चांदी, हीरे, मोती, हाथी, घोड़ा, पालकी... जाने क्या-क्या दे रहे हैं दान में। देखिए ना ! पुत्र जन्मा वसुदेव के और आनंद छाए हैं नंद के द्वारे। पूत भयो वसुदेव के मौन औ नौबत बाजत नन्द के द्वारे... देवकी की गोद का हीरा यशोदा के आंचल से आ बंधा है। वृषभानु के आंगन में खेलती राधा मुदित हैं। लीला के खेल के लिए लीलाधर, जो आ गया है।


जै बोलो किसन कन्हैया की 

अणुभाष्य कहता है, लीला का प्रयोजन नहीं हुआ करता, लीला स्वयं प्रयोजन है। यमुना की लहरों पर मथुरा से ब्रज तक की यात्रा के बाद आरंभ हुई कृष्ण की लीलायात्रा। लीलाएं लोक रंजन के लिए। लीलाएं भयभंजन के लिए। हर लीला के साथ जुड़ता गया एक नया नाम। कहीं मुरली मनोहर, कहीं मनमोहन तो कहीं श्याम... स्मृतियों में, अनुभूतियों में, परंपराओं में, साहित्य में, काव्य में, कला में - हर जगह कृष्ण लीला का अछोर विस्तार है। वली मुहम्मद नजीर अकबराबादी को सुनिए जरा...

"तारीफ करूं अब मैं क्या-क्या, उस मुरली अधर बजैया की।

 नित सेवा कुंज फिरैया की, और वन-वन गउ चरैया की।। 

गोपाल बिहारी बनवारी, दुख हरण महर करैया की। 

गिरिधारी सुंदर श्याम बरन और हलधर जी के भैया की।। 

यह लीला है उस नन्द ललन, मनमोहन जसुमत छैया की। 

रख ध्यान सुनौ दंडौत करौ जै बोलो किसन कन्हैया की"।। 

  गोकुल और वृंदावन की कुंज गलियों में प्रभु चलने लगे। दौड़ने लगे। श्याम छोटे हैं। धूल से सने हैं। मुंह पर दही लपेटे नंद भवन में। अपने नन्हे-नन्हे पांवों से यहां-वहां दौड़ते फिरते हैं। अपने आप में मगन कभी मुस्कुराते हुए, कभी गाते हुए तो कभी खुद से बतियाते हुए... बाल कृष्ण अपनी ही परछाई को माखन खिला रहे हैं। उसे पकड़ने की जिद कर रहे हैं... पीछे दौड़ रहे हैं। छिन में खुश। छिन में उदास। अभी तो वे सबसे रूठे बैठे हैं। चांद पाने को रो रहे हैं। बलदाऊ ने 'काला' कहकर चिढ़ाया भी तो है। और ये मुइ चोटी... ये भी तो इत्ता दूध पीकर भी नहीं बढ़ती। राधा से भी डर है कि कहीं खिलौना चुराकर ले भागी तो... इसीलिए कन्हाई भाग निकले हैं- 'मत लै जाई चुराई राधा कछुक खिलौनों मेरी... नंद के आंगन में मधुर पैजनियों का संगीत बिखर रहा है...

"घूरि भरे अति शोभित श्याम जु, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी। 

खेलत खात फिरें अंगना, पस पैजनिया कटि पीरी कछौटी।।

 वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम करनानिधि कोटी। 

काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी"।।

हां... बड़भागी है कागा। लीलाधर के साथ लीला कर गया, पर सबसे निराली लीला तो सूर की है। गुरु वल्लभाचार्य की एक फटकार ने उन्हें विनय और दीनता से खींचकर वात्सल्य के रस में डुबो दिया है। 'सूर है कै काहे कू घिघियात, कछू लीला कौ बरनन करौ.... तब से सूर इन लीलाओं को गाते नहीं अघाते। वे आकंठ डूब चुके हैं और अब डूबे ही रहना चाहते हैं। लोगों का संदेह जागता है। लीलाओं का ऐसा चित्र खींचने वाला ये सूर किन आंखों से देख रहा है भला! वे तो परीक्षा भी ले डालते हैं। सूर घिघियाते बिल्कुल नहीं। मुग्ध मगन हो गा उठते हैं। 'देखे री हरि...' हरि को देखने की यह आंख बाहर से नहीं, भीतर से आ रही हैं। जहां प्रेम है, वहां यह दृष्टि भी है। जहां प्रेम नहीं, वहां यह दृष्टि कहां से आए ! पूरा ब्रज प्रेम की इसी आंख से हरि को निहार - रहा है। हरि को देख-देख यशोदा मगन हैं। नंद गद-गद हैं। जसोदा के लाल का सौंदर्य देखिए- 'मनोजगर्व मोचनम विशाल लोल लोचनम !

कामदेव के गर्व को धूलिसात कर दे ऐसा है यशोदा का लाल। सांवरी-सलोनी सूरत। विशाल लोचन। घुंघराली अलकें... 'अनंग रंग सागरं नमामि कृष्ण नागर...' वंशीवट, करील और कदंब की डारें, यमुना का किनारा, ब्रज का चप्पा, धरती का कण-कण कृष्ण के रूप में कृष्ण की किलकारी में भीगकर निखर रहा है। कहां तक बखाना जाए वो रूप, वे अनंत लीलाएं... श्याम घुटनों के बल चलकर अभी मुश्किल से आंगन तक पहुंचे हैं पर - बड़े-बड़े असुरों को छका दिया है। पूतना, शकटासुर, बकासुर, धेनुकासुर - कोई नहीं टिक पाया जरा-से बालक के सामने। पूरा ब्रज जय-जयकार कर रहा है, लेकिन सूर की यशोदा चिंतित है, व्यथित हैं... ऐसा कैसे हो सकता है कि उनकी सोटी खाने वाला बालक इतने विशालकाय असुरों को मार सकता है... कहीं कोई बुरी हवा का असर तो नहीं! वो कैसे बचाए अपने लल्ला को लोगों की नजर से! जगतोद्धारक को खिलाती हुई पुरंदरदास की यशोदा भी सोच में हैं..., ये बालक है कौन... अणु-से सूक्ष्म, महत से महीयान?

सनतकुमार के जिन प्रश्नों के उत्तर स्वयं ब्रह्मा भी न दे सके, उनका समाधान किया यशोदा के इसी दुलारे ने। भीष्म जैसे महापुरुष ने जिसकी ईश्वरवत अर्चना की। चेदिराज शिशुपाल को छोड़कर सारी सभा ने एक-एक वचन को मौन होकर सुना और एक स्वर से माना। सांदीपन के यहां रहकर चौदह विद्याओं और चौसठ कलाओं को आत्मसात किया। अंगिरा नामक ऋषि से बारह बरस तक योग की घोर क्रियाएं सीखीं, उसके ज्ञान के बारे में जरा यशोदा से पूछिए। वही जानती हैं, कितना चतुर और जानी है उनका लाल ! कोई ज्ञानी भी इतना ऊधम मचा सकता है भला ! ऊखल से बांधकर रखा जा सकता है किसी ज्ञानी को ! वह मरख तो चांद की परछाई को पाकर ही खिल उठता है। एक हथेली पर माखन दो तो बिलख पड़ता है... दूसरी खाली हथेली उदास हो जाती है। गोपियों से पूछिए। कान्हा... माखन और वस्त्र चुराता है। मटकियां फोड़ता है! छछिया भर छाछ पर ताली दे दे कर नाचता भी है। रुक्मिणों से भी पूछिए... ज्ञानी । कैसे बिना विचारे सुदामा का चिउड़ा खाए जाते थे, अगर वे न रोकतीं तो राम जाने क्या हो जाता ! दुर्योधन से पूछिए, उसका मेवा छोड़कर कैसे तृप्त होकर खाया था विदुर पत्नी के हाथों केले का छिलका! परम सखी द्रौपदी से पूछिए। हां, बड़े ज्ञानी हैं सखा। उसकी बेणी गूंथने वाले ज्ञानी ! राधा से पूछिए... कैसे काली बरसती रात में उनके पीछे-पीछे चला आता है 'भीरुरयम'... चूनर लहंगा पहन कैसे नर से 'नार' बना मुसकाता है! चलिए... ये सब बिसारिए। यह जानते हुए भी कि समयंतक मणि शतधंवा के पास नहीं, अक्रूर के पास है, चुप साध कर क्यों बैठा रहा ये जानी? अपने ऊपर लगे चोरी के कलंक को क्यों नहीं पोंछ डाला तुरंत?...यही तो लीला है। ज्ञान और अज्ञान, दोनों छोरों में बंधी हुई लीला। भोग और वैराग्य, दोनों छोरों को बांधती हुई लीला.... पर ये शास्त्र कहां सीखे हैं, दोनों छोरों को पकड़ना। इन्हें तो बस कोई एक सिरा चाहिए।

"एको देवः केशवो वा शिवो वा एक मित्र भूपतिर्वा यतिर्वा । 

एको वासः पत्तने वा वने वा एका भार्या सुंदरी वा दरी वा"।।

शास्त्र कहता है, 'एक ही देव को पूजो- लोकसंग्रही केशव को या तपस्वी शिव को। एक ही मित्र बनाओ- भूपति को या यति को। रहने के लिए एक ही स्थान चुनो नगर को या निर्जन को और सहचर भी एक ही बनाओ सुंदर नारी को या पर्वत कंदरा को...' यहां बीच का कोई मार्ग नहीं है। या तो ज्ञान या अज्ञान। या तो आलोक या अंधकार। या तो निर्जन या समाज। शास्त्रों की सुनने वाला मस्तिष्क यूं ही तोड़कर सोचता है। बांटकर सोचता है। द्वंद्व करके सोचता है। जीवन एक पर टिका रहे और एक में भी चुनाव... सुख ही रहे, दुख न हो। प्रकाश ही रहे, अंधेरा न हो। जीवन रहे, मृत्यु न हो...। ओशो कहते हैं, 'सूरदास के कृष्ण कभी बच्चे से बड़े नहीं हो पाते। बड़े कृष्ण के साथ खतरा है। सूरदास बर्दाश्त न कर सकेंगे। कोई है, जो कृष्ण के एक रूप को चुन लेगा। कोई है, जो दूसरे रूप को चुन लेगा। गीता को प्रेम करने वाले भागवत की उपेक्षा कर जाएंगे, क्योंकि भागवत का कृष्ण और ही है। भागवत को प्रेम करने वाले गीता की चर्चा में पड़ेंगे, क्योंकि कहां राग-रंग और कहां रास और कहां युद्ध का मैदान ! उनके बीच कोई ताल-मेल नहीं है। शायद कृष्ण से बड़े विरोधों को एक-साथ पी लेने वाला कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। इसीलिए कृष्ण की एक-एक शक्ल को लोगों ने पकड़ लिया है, जो जिसे प्रीतिकर लगी है, उसे छांट लिया है, बाकी शक्ल से उसने इनकार कर दिया है।'

लेकिन स्वयं कृष्ण ने जीवन के किसी रूप से इनकार नहीं किया। समभाव समदृष्टि से सुंदर और असुंदर, सबको पकड़ा। कृष्ण अनेक से एकाकार के लिए अनेक हुए। टुकड़े-टुकड़े में विखरे। जुड़कर जीने और, जोड़कर जीना सिखाने के लिए बिखरे। द्वैत में बंटकर भी अद्वैत को जिया कृष्ण ने। लोहियाजी कहते हैं, 'कृष्ण की सभी चीजें दो हैं। दो मां, दो पिता, दो नगर, दो प्रेमिकाएं या कहिए अनेक... यूं, कृष्ण देवकीनंदन हैं, लेकिन यशोदानंदन अधिक... वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं और नंद को असली बाप से बढ़कर ही रुतबा मिल गया है... प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्यभामा की, राधा और रुक्मिणी की, या राधा और द्रौपदी की...।' बालक, विद्यार्थी, सखा, प्रेमी, पिता, पुत्र, योद्धा, जननायक, दूत, सेवक, सारथी, रसज्ञ, तत्वज्ञ सभी रूपों को पूर्णता से निभाते हैं कृष्ण। कृष्ण जीवन को समग्रता में आत्मसात करते हैं। जीवन के सब रंगों से खेलते हैं। राग से भी, विराग से भी। योग से भी, भोग से भी। कर्म से भी, काम से भी। माया से भी, मोह से भी। युद्ध से भी, पलायन से भी। रास से भी और तांडव से भी... 

कृष्ण और तांडव !

तांडव तो विध्वंस का नृत्य है। मृत्युदेव शिव ही साध सकते हैं तांडव । कृष्ण का नृत्य तो लास्य को परम आनंद तक ले जाता है। उनका तांडव से क्या नाता ! लेकिन नाता तो है। सृजन के लिए ध्वंस जरूरी है। कृष्ण भी तांडव करते हैं। सृजन के लिए ध्वंस करते हैं। यमुना को दूषित होता देख प्रदूषण के विषधर को यमुना से निकाल भगाते हैं। प्रदूषण के विरुद्ध प्रथम शंखनाद करते हैं। कालिया के सहस्र फनों पर कृष्ण का नृत्य सृजन के उल्लास का नृत्य है। यमुना में विष के विध्वंस का उल्लास। यमुना में अमृत के सृजन का उल्लास। वीभत्स रस में आनंद के सृजन का यही उल्लास कंस वध में भी मुखर होता है। अभिमान, अत्याचार और अन्याय का सिर कुचलकर यूं ही नृत्य करता है कन्हाई... 'मार-मार लट्ठन के झूर कर आए हो...' कान्हा के साथ सारा ब्रज झूमता है। जय-जयकार करते नहीं थकता। थके भी क्यों - ये कान्हा भी तो नहीं थकता। एक के बाद एक लीलाएं किए जाता है। और कुछ नहीं तो, इंद्र से ही झगड़ा। इंद्र जैसे देव की पूजा रोक दी। मां ने भोग लगाना चाहा तो उनसे भी झगड़ा। मां ने समझाया, वो बड़ा देवता है। गुस्सैल है। बड़े लोगों का भय मानना पड़ता है। कान्हा हंसकर अपनी छोटी अंगुली पर उठा लेता है गिरिराज गोवर्धन को... 'मां! डरो मत इंद्र से बड़ा देव तो मैं हूं। हम सब हैं। हम सब गोप, ग्वाल, किसान, जो इस धरती को अपने अथक श्रम से सींचते हैं। उनके आत्मबल से बड़ा थोड़े ही है विलासी इंद्र का आत्मबल।' यह है समिष्टि के सुख की लीला। अभिमान, अत्याचार और अन्याय के अंत की लीला... इंद्र के भय का पर्वत राई की तरह उठा लेता है कन्हैया। गोवर्धन धारी बन जाता है।

"गोवर्धन धारी नाम कुंवर को जब ही ते हम लीनौ

 सात दिवस गिरिवर कर राख्यौ इंद्र मान भन कीनौ।

 भलै खायौ चोरी दधि ब्रज में भले दान दधि छीनौ,

 नागरिया घर-घर को माखन आज सुफल कर दीनौ"......

कैसा है ये राधा का श्याम। माखन चुरा-चुराकर कौन-सी विद्या सीख ली इसने कि सबके मन एक कर दिए और एक कर दिए सबके भय, हर्ष और आंसू ।

शाबार ऊपरे मानुस सत्य ताहार ऊपरे नाई...

  कृष्ण जागरण के देवता हैं। जननायक हैं। नर-नारी की समता का जागरण सर्वप्रथम कृष्ण ही करते हैं। इंद्र और कंस जैसे अत्याचारियों के विरुद्ध जागरण की प्रथम आवाज उठाने वाले भी कृष्ण हैं। कृष्ण अपनी मानवीय छवि में आत्म जागरण की क्रांति का सूत्रपात करते हैं। सिखाते हैं कि भय को त्यागो। अत्याचार की सत्ता को मिलकर उखाड़ फेंको। मिलकर चुनौतियां स्वीकारो। मिलकर बुराई का सामना

  महाभारत, शाति पर्व, अध्याय-82:

  • हे देवर्षि! जैसे अग्नि को प्रकट करने की इच्छा वाला पुरुष अरणीकाष्ठ (आगे जलाने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली लकड़ी) का मंथन करता है, उसी प्रकार इन कुटुंबी-जनों का कटुवचन मेरे हृदय को सदा मथता और जलाता रहता है।
  • हे नारद! बलराम सदा बल से, गद सुकुमारता से और प्रद्युम्न रूप से मतवाले हुए हैं। इससे इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हुआ हूं। 

  • नारदजी! मैं सदा उभय पक्ष का हित चाहने के कारण दोनों ओर से कष्ट पाता रहता हूं। वह उपाय आप बताने की कृपा करें, जिससे ऐसी दशा में मेरा तथा मेरे इन भाइयों का भला हो।

करो। देवताओं को न आसमान में खोजो, न दमन में। वह देवता, जो रक्षा करता है, जो प्रेम करता है, वह यहीं है तुम्हारे ही भीतर। कृष्ण साधारण में असाधारण होने का विश्वास जगाते हैं, मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। मध्य युग में आकर बांग्ला कवि चण्डीदास भी वही दोहराते हैं 'शाबार ऊपरे मानुस सत्य ताहार ऊपरे नाई...' कृष्ण मानव रूप में मानव के इसी महामानवीय रूप की प्रतिष्ठा करते हुए मिलते हैं। धर्म की रक्षा के लिए अधर्म से लड़ते हैं। झूठ बोलते हैं। झूठ बुलवाते हैं। छल करते हैं। छल कराते हैं। नियमों को तोड़ते हैं और तुड़वाते हैं।

प्रोफेसर ई. डब्ल्यू. हॉपकिन्स 'ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया' में लिखते हैं कि श्रीकृष्ण ने जैसे को तैसा वाली नीति (Tit for Tat) का अवलंबन लिया और खुल्लम-खुल्ला धर्म की मर्यादा को चुनौती दी। मर्यादा के इस प्रश्न पर आर. ए. रोजर्स का कथन हॉपकिन्स की इस समालोचना का जवाब देता है। वे कहते हैं, 'मर्यादा (Morality) उन नियमों के समुदाय का नाम है, जिनके आधार पर किसी युग विशेष में किसी जाति विशेष के लोग अपने कमाँ के औचित्य या अनौचित्य का निर्णय करते हैं और जो विधि निषेधात्मक वाक्यों के रूप में व्यक्त किए जाते हैं। परंतु जो व्यक्ति मुक्त होकर ईश्वर रूप बन जाते हैं, वे काल, जाति, समाज, नियम, व्यवस्था, विधि-निषेध इन सबसे परे होते हैं। वे नियमों और कानूनों के बंधन में नहीं रहते, वे तो अपनी ही प्रबुद्ध आत्मा के द्वारा निश्चित किए हुए नियमों का अनुसरण करते हैं...'

मर्यादाओं से मुक्त होकर भी कृष्ण की स्वतंत्रता अमर्यादित नहीं है। राम मर्यादाओं से बंधे हैं, लेकिन कृष्ण स्वतंत्र हैं। मर्यादा के नाम पर कृष्ण कभी दमन नहीं करते, जो कुछ करते हैं, वह खुलकर करते हैं। छिपाव के साथ नहीं, मुक्ति की घोषणा के साथ करते हैं। मुक्त होकर खेलते हैं। मुक्त होकर खाते हैं। मुक्त होकर प्रेम करते हैं। मुक्त होकर सेवा करते हैं, रक्षा करते हैं, युद्ध करते हैं और युद्ध से पलायन भी। डॉ. विद्या निवास मिश्र कहते हैं, 'श्रीकृष्ण को हटा दीजिए हिंदुस्तान के साहित्य से, कला से, संगीत से, जीवन से तो आपके पास बचेगा क्या...?, डॉ. लोहिया बड़ी अच्छी बात कहा करते थे कि राम का चरित्र ऐसा है, जिसके पीछे चलने को मन होता है। राम आगे हैं तो आश्वासन होता है कि कोई आगे है, जो राह बताएगा। जिस राह पर चलेगा, वह राह अच्छी होगी। शिव को पूजने की इच्छा होती है, ऐसा देवता, जिसके पास अपना कुछ भी नहीं, सारे संसार का मालिक है। ऐसे आदमी को पूजने की इच्छा होती है और कृष्ण को प्यार करने की इच्छा हो, न हो, बरबस होती है कि कृष्ण को प्यार किए बिना काम नहीं चलता।' कृष्ण के लिए सबका प्रेम और सबके लिए कृष्ण का प्रेम... यही तो प्राण है भागवत का। गोपी गीत में कहता है कि श्रीमद्भागवत में सारे दूसरे राग छोटे पड़ जाते हैं। बेशक कृष्ण रागानुरागी हैं, लेकिन परम वैरागी भी तो हैं। सूर की गोपियां कहती रहीं... 'मधुकर काके मीत भए... रस लेने के बाद इन्हें तो अनंत उड़ना ही है। कृष्ण काले हैं। भ्रमर जैसे काले, लेकिन भ्रमर नहीं हैं। । कृष्ण के पैरों में गोपियों का कोई उलाहना, कोई उपालंभ, कोई मोह की बेड़ी नहीं डाल पाया। भोग की गाथाएं रचकर योग पढ़ाने पठा दिया था ऊधौ को। युधिष्ठिर = के यज्ञ में पैर धोए। अर्जुन का रथ हांका। उग्रसेन के यहां सेवा की। ब्रज छोड़ा। वृंदावन छोड़ा। नंद, यशोदा, राधा, मुरली... सबको छोड़कर चले गए। अर्जुन के कानों में गीता का रहस्य घोलकर उसे भी छोड़ दिया। उद्धव और दारुक सेवा को आतुर थे, पर कृष्ण ने कहा, 'जाओ...'

कृष्ण देखते रहे एक-एक कर सबको जाते हुए... शांब, - अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, बलदाऊ...सब अपनी राह पर बढ़ रहे हैं। अपना मार्ग चुन रहे हैं। अपनी गति को प्राप्त हो रहे हैं... कृष्ण सब देखते रहे। पुत्रों और पौत्रों से भरे कुल में सबसे कितना असीम मोह है कृष्ण को, लेकिन एक को भी नहीं रोकते। किसी 1 को भी नहीं बचाते। कैसे बचाएं... कितना समझाया था, फिर भी इन लोगों ने वन काटे। धरती को सताया। सत्ता का केंद्रीयकरण किया। गर्व के मद में ऋषि का शाप पाया। इसी शाप से सोने से जड़ी द्वारिकापुरी पलक झपकते जलमग्न हो जाती है। कृष्ण कुछ नहीं करते। सब कुछ करने की क्षमता होते हुए भी कुछ नहीं करते। शांत द्रष्टा-से देखते जाते हैं सब... विराग... हां, यही हैं कृष्णलीला के अनंत प्रवाह में बिखरे विराग के मोती......लेकिन गौर से देखिए... इस विराग में भी राग छिपा है। कृष्ण सबके साथ चलते हैं, पर किसी के आगे जाना नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि सब उनकी अंगुली थामे रहें। कठपुतली बने रहें। वे मार्ग दिखाते हैं, लेकिन मार्गदर्शक बने रहने का मोह नहीं पालते। सबको मोह में डालकर मोह से छूटते रहे कृष्ण। सब कुछ भोगकर त्यागते रहे। सब कुछ त्यागकर भोगते रहे। कृष्ण ने इतना प्रेम बांटा इतना प्रेम बटोरा कि सबके भीतर वही प्रेम रंग भर गया। साहित्य, संगीत, कला जिधर देखि, उधर श्याम रंग है।

"उठा बगूला प्रेम का तिनका चढ़ा अंकास। 

तिनका तिनके से मिला तिन का लिन के पास"।।

इस रंगरेज ने खूब रंगा है सबको। प्रेम की अकथ छलकन से छलक रहा है अग-जग। अम्लान स्नेह झर-झर बरस रहा है प्राणों के कन-कन से। गोपियां कहते नहीं थक रहीं,

"बल बल जाऊं में तोरे रंग रजवा 

अपनी-सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके 

खुसरो निजाम के बल-बल जाए 

मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

 छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके"।।

निराली प्रीत है इन गोपियों की। रंग भी श्याम और पिया भी।- श्याम रंग में रंगकर अपना रंग खोना चाहती हैं ये गोपियां ! मैं न रहूं। बस तू रहे... और एक दिन तू भी न रहे। कोई द्वैत न रहे। कोई अद्वैत भी न रहे। मिट जाए, सिमट जाए, खो जाए... मैं भी और तू भी।

"चलत, चितवत दिवस जागत सुपन सोवत रात। 

हृदे ते वह श्याम मूरति, छिनान इत-उत जात"।।

उद्धव ब्रज आए तो देखा कि गोपियां बड़ी तल्लीन हैं अपने कामकाज में। हर काम मगन होकर कर रही हैं। गाय दुहती हैं। मूसल से धान कूटती हैं। दही विलोती हैं। मक्खन निकालती हैं। भोजन बनाती हैं। घर लीपती हैं। रोते बालक को बहलाती है, पुचकारती हैं, उबटन लगाती हैं। सोलह श्रृंगार सजाती हैं। हर काम दत्तचित्त होकर कर रही हैं। किलकारियों से भरे-पूरे घर का आनंद भोगती हैं, लेकिन उन सबका मन रमा है कृष्ण में... 'कृष्ण गृहति मानसाः ' जिसने कृष्ण को चाहा, वो कृष्ण से अलग कैसे हो सकता है! कर्म को कैसे त्याग सकता है!

नंद से बात करते हुए उद्धव रातभर जागे हैं। अब भोर के पदचाप सुन रहे हैं। धरती की सोहनी सेवा (बुहारती हुई) करती हुई गोपियां भज रही हैं श्याम का नाम। पता चल रहा है कि भोर चली आ रही है गुलाबी चूनर पहने। दही बिलोती गोपियों के गीत के साथ अब कुंवर की पुकार हो रही है कलेवा के लिए। दही मथती गोपियों का कोकिल कंठी आह्वान पुकार रहा है अपने दुलारे माखनचोर को... 'हरि आ जाओ... हरि आ जाओ...' ये आह्वान गोपियों के हर काम के साथ गीत बनकर गूंज रहा है। हर दिशा से गूंज रहा है। सबने आंगन लीपा है। उसके स्वागत के लिए ही लीपा है। भोजन में एक नहीं दो नहीं, पूरे छप्पन भोग सजाए हैं। सबकुछ उसी के लिए बनाया है और ये नख-शिख का सोलह श्रृंगार भी तो उसी के लिए है...

"तू सबका खुदा सब तुझ पे फिदा, अल्लाहो गनी अल्लाहो गनी।

 हे कृष्ण कन्हैया नंदलाला, अल्लाहो गनी अल्लाहो गनी"।। 

  लुभावनी है न ब्रजवासियों की प्रीत की ये रीत! इसीलिए तो ब्रज की रज में रज होकर मिल गए कृष्ण। हर कण में श्याम... कण-कण में श्याम... ब्रजभूमि ने कृष्ण को ऐसे आत्मसात किया और इतना आत्मसात किया कि ब्रज कृष्णमय हो गया और कृष्ण ब्रजमय हो गए। ये ब्रजरज, ये वृंदावन, ये गौ धन, ये गोपी-ग्वाल... सब प्रिय हैं कृष्ण के और इन सबके प्रियतम हैं कृष्ण। इतना प्रेम कृष्ण कैसे समेटें अपने दामन में। छलका ही जाता है। इस प्रेम की बूंद जहां-जहां गिरती है, वहां-वहां प्रेम का बगूला उठता है। भक्ति की तरंग हिलोरें लेती हैं। जीवन आनंद बनकर गूंज-गूंज उठता है। भागवत में व्याप्त है इसी गुंजरण की अनुगूंज, लेकिन महाभारत को यह आनंद नहीं मिल सका। वहां पर तो सिर्फ शंख गूंजता है। द्वंद्व गूंजता है। सत्ता की उठापटक और राजनीति के प्रपंच गूंजते हैं और गूंजती है युद्ध की भीषण दुंदुभि। महारास के समय जब कृष्ण ने गोपियों से कहा, 'हे! गोपियो, देव जन्म पाकर भी मैं तुम्हारे निष्काम प्रेम, त्याग और सेवा का बदला नहीं चुका सकता। मैं जनम जनम तुम्हारा ऋणी रहूंगा।' तब खिलखिला कर हंस पड़ी थीं गोपियां, 'अच्छा परिहास है कान्हा ! भला देव भी ऋणी हुआ करते हैं कभी ! भला प्रेम का ऋण भी चुकाया जा सकता है कभी !' प्रगाढ़ प्रेम से भरी ब्रजनारी कभी उऋण नहीं होना चाहती। न उऋण होने देना चाहती है। चीर घाट पर जाकर आज भी वो चीर बांधती है। इस अखंड विश्वास के साथ कि समय आने पर कान्हा ही उनकी चूनर को अनंत करेगा। जैसे उसने अनंत किया था द्रौपदी की चूनर को।

आर्यावर्त की अधीश्वरी द्रौपदी हो या द्वारिका की महारानी रुक्मिणी। ब्रज के धनपति वृषभानु की बेटी राधा हो या कंस की मालिन कुब्जा... कृष्ण के साथ कोई स्त्री दोयम नहीं है। हर स्त्री अपनी स्वतंत्र सत्ता और स्वाभिमान के साथ मिलती है। कृष्ण की गोपियों के स्वातंत्र्य का स्वर बखूबी पकड़ा है सूर ने - 'ऊधौ मन माने की बात...' ऊधौ... हम वही करेंगी, जो हमारा मन चाहेगा। तुम कोई बात हम पर नहीं थोप सकते। कोई विचार आरोपित नहीं कर सकते हम पर। उद्धव जैसे ज्ञानी को दो टूक जवाब देने का ऐसा साहस कृष्ण की गोपियां ही दिखा सकती हैं। इस योगी को ऐसा भिगोया गोपियों के प्रेम रस ने कि योग की वर्णाक्षरी भूलकर वे भी कह बैठे,

'बस-बस... अब मैं कृष्ण के पास भी नहीं जाना चाहता।'

'तो रहोगे कहां?'

'वृंदावन में।'

'क्या गोपी होना चाहते हो?'

'ऐसा सौभाग्य कहां... बस उनके चरणों की रज मिले वही काफी...'

उद्धव गोपियों की चरण रज में लोटना चाहते हैं। कृष्ण भी तो कहते हैं, 'वृंदावन परित्यज्य नैव गच्छाम्यहमक्वचित।।' मैं वृंदावन छोड़कर कभी नहीं जाता, लेकिन एक बार, जो ब्रज छोड़कर गए तो मुड़कर देखा तक नहीं। कृष्ण क्या गए, मानो शरीर से प्राण ही चले गए। कभी न खत्म होने वाली प्रतीक्षा और कभी न बीतने वाले वो तीन दिन... आस संजोए-संजोए आंखें पथरा गईं। सेवा कुंजों की शोभा जाती रही। पेड़ सूख गए। यमुना मलिन हो गई। कृशगात गाय गौचारण के स्थानों को सूंघती हुई वन-वन ढूंढ़ती रहीं अपने गोपाल को - 'एक बन ढूंढ़ि सकल बन ढूंढ़ौ कतहु न श्याम लहौ...' कहां मिला गोपाल? मिलता भी कैसे, उसने तो अपना पूरा जीवन सौंप दिया था जन के कल्याण के लिए। मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए। कितने ही गोकुल, वृंदावन, बरसाने बसते और उजड़ते रहे, लेकिन लोकजीवन की दिशा में एक बार बढ़े हुए कदम पीछे नहीं लौटे। बस दो कोस पर ही तो थी मथुरा, फिर भी कोई गोपी मथुरा नहीं गई। जाती भी तो क्या मथुरा में मिल जाता उनका गोपाल ? वहां तो कंस को मारने वाला पराक्रमी कृष्ण था। जो गोपियों के प्रेम का मधु न छका होता तो कैसे संभव होती यशोदा के लाल से द्वारिका के अधिपति होने तक की विषम यात्रा? आगे गरल ही गरल था। बड़ी-बड़ी समस्याएं थीं। 

आनंद उमंग भए, जै हो नंदलाल की।।

ओशो कहते हैं, 'वे धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं है, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं।... कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं, हंसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास आंसुओं से भरा हुआ था। हंसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने वाला धर्म है कृष्ण।'

कृष्ण भाब हैं। कृष्ण भक्ति हैं। कृष्ण मानव हैं, महामानव हैं। कृष्ण आनंद हैं। कृष्ण उत्सव हैं। उनकी भूमि में, उनकी माटी में बहुत गहरे रच-बस गया है ये उत्सवी भाव। यह प्यारे प्रभु का धाम ब्रजधाम है। यहां हर दिन उत्सव। हर क्षण आनंद। रसराज की भूमि से उल्लास का रस छीजे भी कैसे! कभी शरदोत्सव तो कभी रथयात्रा। मंदिरों में फूल बंगलों की सज-धज। हवेली संगीत के मिसरीले स्वर। ध्रुपद, धमार, विष्णुपद, कीर्तन, संकीर्तन, समाज गायन, ख्याल, टोडी, टप्पा, तराना, कौल और रसिया गायन... कितने संगीताचार्यों ने इन्हें अपने स्वर में साधा और साधना की श्यामा-श्याम की। मानो साक्षात नाद को ही कृष्ण के रूप में साकार करके लाइ लड़ाती है ये मथुरा भूमि। ब्रज में ही जन्मे सोलह हजार राग और रागनियां। बलराम की प्रिय मल्लयुद्ध और दंगल की परंपरा आज भी कायम है। रथ के पहिए पर हजारों दीए सजाकर होता है चरुकुला नृत्य। यमुना छठ, चुनरी मनोरथ, हरियाली तीज, बिहार पंचमी, रंग पंचमी, अक्षय तृतीया पर बांके बिहारी के चरण दर्शन, वसंतोत्सव, लठमार होली (बरसाना, नंदगांव), कंसवध मेला, गौचरण (गोपाष्टमी), मयूर नृत्य, झांझी-टेसू, हर छठ, राधा अष्टमी, गोवर्धन पूजा... एक कृष्ण और कितने उत्सव। हर उत्सव के केंद्र में कृष्ण। कृष्ण की ये भूमि कहती है... आओ... प्रेम बांटो... प्रेम बटोरो... जीवन का आनंद उठाओ... ताकि दबे पांव गुजर न जाएं, खुशी के, नृत्य के पल...।।

कंस, जरासंध, और धृतराष्ट्र जैसी चुनौतियां थीं। पीछे था अपने रस से सींचने वाला ब्रज, प्रीत की नदी यमुना, कदंब की छाया जैसे मां-बाबा, बचपन के संगी-साथी ग्वाल-बाल, गोप-गोपिकाएं, सखियां ! और हां... प्राणों से प्यारी मुरली और प्राणों की आधार राधा भी... राधा... कौन राधा? अरे ! राधा को कौन नहीं जानता। हरिदास जैसे संतों को ही देखिए। एक वस्त्र और एक माटी का करवा। जीने के लिए इन्हें इससे ज्यादा नहीं चाहिए कुछ। कंठ में साधे बैठे हैं सरस्वती को और उसी से राधा भाव से भजते रहना चाहते हैं कृष्ण को।

राधे अलबेली नवेली रस नागरी...

ये अलबेली है। नवेली है। रस नागरी है। पर... इसको भागवत से पहले तो कभी देखा भी नहीं, 'औचक ही तह देखी राधा नैन बिसाल भाल दिये रोरी...' दशम स्कंध में अचानक ही दिखी थी वहां और देखते ही देखते आराधिका से आराध्य बन बैठी ! राधिकोपनिषद की सुनिए। कहता है कि इसका नाम राधा है, क्योंकि इसकी नित्य आराधना करते हैं श्रीकृष्ण और ये खुद सम्यक आराधिका है श्रीकृष्ण की, इसीलिए राधिका भी है...

"कृष्णेन आराध्यत इति राधा।

 कृष्ण समाराधयति सदेति राधिका"।।

ज्ञानियों ने भी तो बड़े जतन करके वेदों में से एक नाम खोज निकाला है 'राधः' तो क्या ये गुन-गरबीली रसिक-रसीली, छैल छबीली किशोरी साक्षात लíक्ष्मी ही है! कौन जाने ! सिवाय कृष्ण के कौन जान सकता है उसे ! राधा को जानने के लिए कृष्ण का हृदय चाहिए। प्रेम में पगी दृष्टि चाहिए। जित देखौ तित श्याम मयी है... यमुना भी, कदंब भी, करील भी और तमाल भी। ये सब श्याम एक होकर राधा राधा रटते हैं। इतने श्याम, अकेली राधा। अब ऐसा भला क्या है इस राधा में कि स्वयं ब्रह्म इसके चरणों में झुका है, जो सबको खींचता है। सारी दुनिया को खींचता है। वो इस पर खिंच रहा है। इसके कर्षण से खिंच रहा है। भला कौन-सी तपस्या की है इस राधा ने, जो अखिल सृष्टि को नचाने वाला इसके लिए नाच रहा है। नारी वेश बनाकर नाच रहा है। सबके स्वामी हैं कृष्ण, लेकिन ये तो सबके स्वामी की भी स्वामिनी है। अर्जुन का रथ खींचकर भी, द्रौपदी की चोटी गूंथकर भी, लोगों के पैर धोकर भी किसी के दास नहीं हैं कृष्ण। सबके पूज्य है, लेकिन ये तो सर्वपूज्य की भी पूज्या है। अलबेली सरकार है। देखिए तो सही, सारे ब्रह्मांड को अपनी आंखों में समेट रखा है कृष्ण ने और खुद सिमट गए हैं राधा के नयनों में। राजस्थान में 'वणी-ठणी' होकर बैठी राधा के नयनों में तनिक झाकिए, शायद वहां कुछ थाह मिले। भिखारीदास ने तो यहां एकावली अलंकार का सहारा लिया है। राधा के नयनों से नाथ लिया है उन्होंने पूरे ब्रह्मांड को।

"होत मृगादिक से बड़े बारन, बारन वृंद पहारन हेरे।

 सिंधु में कैसे पहार परे, पुष्हुयी में विराजत सिंधु घनेरे। 

लोकनि में पृथ्वी त्यो किती, हरिबोदर में बहू लोक बसेरे। 

ते हरि 'दास' बसे इन नैनन, एते बड़े दृग राधिका तेरे"

कितने विशाल हैं ये नैन! इन्हीं नैनों के बाण से राधा ने बींध लिया है ब्रजराज को। चारि आंख होत ही हजार आंख है गईं...राधा रसराज की आनंदमूर्ति बन गई है। आल्हादिनी शक्ति बन गई है। कृष्ण इसके शृंगार के लिए अंजन शिला गढ़ते हैं। मानसी गंगा रचकर पैर पखारते हैं। कभी मालिन बनकर फूल बेचने आते हैं। कभी मनिहारिन बनकर चूड़ी पहनाने चले आते हैं और उस दिन तो जाने क्या सूझा था कान्हा को। एक तो काली रात ऊपर से घनघोर वर्षा और दामिनी। बरखा ने जैसे पैरों में नूपुर बांध दिए। हुलस उठा था जिया। मोहक रूप सजाया। कारी कमरिया ओढ़ी और दौड़ पड़े निकुंज की ओर। गालों पर झूलती घुंघराली अलकें, मोरपंखा, कजरारे मदमाते नयन, मकराकृति कुंडल, करधनी, पैंजनिया, वनमाल... ब्रजभूमि बेसुध हो रही थी इस रूप को देख-देख। प्रेममद से छके कृष्ण स्वयं भी अपने सौंदर्य पर मुग्ध हो रहे थे। तभी घोर अंधकार में एक सिंदूरी हंसी गूंजी....

'कौन... राधे?'

'नहीं, किंकरी - राधे की सखी... कृष्ण प्रेम विह्वल से बोले, 'कहां जाती हो सखी? तनिक ठहर तो। मेरा यह रूप निहारो..."

कंटीली चितवन वाली किंकरी ने लंबा घूंघट खींच लिया, 'तू क्यूं मेरा धर्म भ्रष्ट करना चाहता है कान्हा'

इतना दर्प ! ऐसा तेवर !! राधा की किंकरी का इतना मान !!! सारे धर्मों का सार हो जिसकी प्राप्ति, भला कौन-सा धर्म ऐसा है, जो उसके दर्शन से खंडित हो सकता है...? कृष्ण ने पूछा, 'सखी आखिर वो तेरा कौन-सा धर्म है, जो मुझे देखने से खंडित हो जाएगा?'

किंकरी हंसी... 'सुन सांबरे, तू किसी भ्रम में न रहना। तू हमें प्रिय है, क्योंकि तू हमारी प्रियतम सखी का प्रिय है। क्या तू नहीं जानता कान्हा कि हम 'अमनिया' नहीं खातीं। बिना भोग लगाए हम कुछ भी ग्रहण नहीं करतीं, लेकिन अब जब तेरे मन में आ ही गई है तो जा... जाकर हमारी लाड़ली राधा का दर्शन कर आ। जब वो अपनी नजरों से तुझे देख लेगी तो तू हमारे लिए प्रसाद हो जाएगा...!

धन्य थी किंकरी। धर्म का सार कहने वाले को भी धर्म का पाठ पढ़ा दिया। प्रेम की वर्णमाला सिखा दी।

कृष्ण के प्रेम की वर्णमाला राधा ही तो है। इतनी स्त्रियां रहीं कृष्ण के जीवन में, लेकिन कोई भी राधा न हो पाई, क्योंकि राधा विरल है। राधा होना विरल है। द्वारिका में क्या कुछ नहीं है। सुंदर महल चौबारे हैं। तमाम ऐश्वर्य हैं। सुंदर पत्नियां हैं, लेकिन राधा नहीं है। द्वारिका में राधा हो भी कैसे? राधा का नेह तो सलोने श्याम से था। द्वारिका के सत्ताधीश को क्या जाने ये सीधी-सादी ब्रजवासिन ! कृष्ण के पीछे-पीछे कहां-कहां नहीं दौड़ी राधा... लेकिन मथुरा नहीं गई। जिसने मुरलीधर को चाहा, वो क्यों जाती शंख फूंकने वाले के पीछे। अपने किनारों के बाहर कैसे बहती ये नदी! किनारों के पार विध्वंस का भय, जो था। बस इतना भर कहा, 'जा कान्हा... ब्रज ने अपनी मिठास से सींचा है तुझे इसे कभी खारा मत होने देना...' राधा के शब्दों की पोटली हृदय में सहेजकर चले गए कृष्ण। कहां जान सके पीछे राधा के आंसुओं ने कितनी खारी कर डाली यमुना । यमुना ने राधा का सारा खारापन पी लिया। राधा को खारा नहीं होने देना चाहती थी यमुना। एक नदी थी और एक स्त्री... लेकिन दोनों जीवन भर समेटती रहीं एक दूजे का दर्द।

'जा कान्हा... ब्रज ने अपनी मिठास से सींचा है तुझे। इसे कभी खारा मत होने देना...' द्वारिका के समुंदर का खारा गर्जन मन के भीतर से राधा के शब्दों की पोटली को बिखेर गया है। परसों की कह कर चले थे, आज बरसों बीत गए। सुधियों की मिठास वर्तमान के खारेपन को और गहरा रही है। कुरुक्षेत्र में उत्सव है। सूर्यग्रहण पड़ा है। सारे परिजन इकट्ठे हो रहे हैं। कृष्ण को आस है कि शायद राधा भी आए। क्या कहेंगे राधा से। खारे जल का ये शोर कैसे छिपाएंगे राधा से। अपार जनसमूह के बीच रुक्मिणी, सत्यभामा, जामवंती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा... सबकी दृष्टि उसे ही खोज रही है, जिसे खोज रहे हैं कृष्ण। एक अतीव सुंदर गोपी है तो सही। नीला परिधान पहने, गोरे मुख पर काली चुनरिया का घूंघट खींचे अपनी ही पायल की धुन पर तैरती हुई सी... क्या यही राधा है। अरे... इस पर तो अभी तक श्याम का रंग चढ़ा है! पर इतनी चुप क्यों है? पास क्यों नहीं आती? चुप तो कृष्ण भी हैं। कहने, सुनने, बताने, जताने के लिए कितना कुछ है, लेकिन एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं। सारा आकर्षण, सारी खुशी, सारा सुख - सबकुछ मौन बनकर भाषित हो रहा है। प्रेम पगे नयन बस एकटक देखे जा रहे हैं। अधीर मन की भाषा मौन होकर भी कितनी मुखर हो रही है, कोई नहीं जानता ! अभी-अभी राधिका के गीले नयन झपके हैं। एक नदी आंखों से टूटकर बही है। दो तारे कृष्ण की आंखों से भी टूटकर झरे हैं। प्रेम का परिमल कथन इससे अधिक हो भी क्या सकता है...

"खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,

जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार"

राधा बस डूबी थी। उबरने या पार जाने का मोह कहां था उसे ! भक्ति, भाव, प्रेम, आनंद और समर्पण सबका आत्म विभोर रूप हो गई राधा। कृष्ण के हृदय की अनश्वर दीपशिखा बन गई। सगर्व। शीर्षस्थ। अपराजेय। राधा होने के लिए अहम का समर्पण चाहिए। जहां अहम होगा, वहां समिधा कहां जलेगी। प्रेम का यज्ञ कैसे होगा। जहां अहम होगा, वहां न राधा होगी। न रास होगा... और इनके बिना ब्रज भी कहां होगा !

ब्रज को लत पड़ी है। उसे प्रेम का पीयूष चाहिए। बंसी की तान चाहिए। रास का उल्लास चाहिए। हरिदास का निधिवन रास की भूमि है। यहां पेड़-पौधे नृत्य की आंगिक मुद्राओं में खड़े हैं। मानो गोपियां नाचते-नाचते जड़ हो गई हों। यहां दो घड़ी ध्यानस्थ होकर बैठिए। कृष्ण की तान पर राधा की तिरप सुनाई देगी। राधा के आलाप पर कृष्ण की थिरक दिखाई देगी। नृत्य और नाद की यही सरस संजीवनी... महारास !

आह! कैसा विहंगम दृश्य। कैसी माधुरी रचना। प्रकृति ने हजारों आंखों से देखा। यमुना ने अपने जल में सहेज लिया नवरस की उस साक्षात अभिव्यक्ति का प्रतिबिंब। जिसने भक्ति की आंख से देखा, वो झूम उठा। जिसने भाव होकर देखा, वो गा उठा और जिसने ज्ञान की आंख से देखा, उसने माना कि ये मन की वृत्तियां ही तो हैं, जो हजारों-हजार गोपिकाएं बनकर नाच रही हैं। मन की प्रत्येक वृत्ति के साथ आत्म-रस में सराबोर होने का उत्सव ही तो है ये महारास।

शरत के पूर्ण चंद्र की छिटकती हुई चांदनी। जैसे सारी सृष्टि जाग उठी... कान्हा ने मुरली बजाई और बेबस पुतलियों-सी खिंची चली आई गोपियां। मन से मन के तार मिले और अनहद की बांसुरी पर गूंज उठा रस का उत्सव। सृष्टि विमोहित। विमुग्ध। बेसुध। भाव, भक्ति और ज्ञान- सारी आंखें मूंदकर नाट्याचार्य शिव इसे देख प्रेमरूप हो उठे। शिवा विस्मित थीं। आज न शीश पर रुक्ष जटाएं थीं, न बाघाम्बर। भयकारी छवि कैसी मनोहर हो उठी थी। चंदन की गंध से महकता तन। काजल सजे मदमाते नयन। सुंदर आभूषण और अतिमोहक स्त्री वसन...! 

"नारायण ब्रजभूमि को, को न नवावै माथ, 

जहां आप गोपी भये श्री गोपेश्वर नाथा"

शिव ने देखा। युगल समूहों के बीच हैं श्यामाश्याम। एक-दूसरे का प्रेमाभिषेक कर रहे हैं। अद्भुत आनंद है। आनंद में रंगे श्याम। आनंद में रंगी श्यामा। आनंद से भरे सखा। आनंद से भीगी सखियां। सब ओर आनंद ही आनंद। इस अनुपम आनंद में धूमिल हो रहा है 'द्वैत' और 'मैं' का स्वर। वट वृक्ष के पीछे छिपे शिव भी भला कब तक अछूते रहते। देह गति में परिवर्तन होने लगा। शिव का आनंद मुखर हुआ तो सब वाद्य मूक हो गए। अपनी वाणी से ही मृदंग का ओजस्वी उद्घोष करते हुए वे बाहर निकले। सब मंत्रमुग्ध। ऐसा गायन! ऐसा नृत्य ! ऐसा सौंदर्य! कौन है ये अलबेली सखी? कृष्ण ने शिव को पहचाना। आगे बढ़े। साथ नाचने लगे। वही शिव, जिनके तांडव ने सृष्टि को भस्मीभूत किया, आज अपने नृत्य से ब्रजभूमि के हृदय पर हरीतिमा के हस्ताक्षर अंकित कर रहे थे। राधा बड़ी देर तक निहारती रही इस नई-नवेली नार को। फिर अतिशय अधीर हो कृष्ण के समीप पहुंची। कृष्ण को परिहास सूझा। वे और मगन हो-होकर नाचते रहे। खीज से भरी राधा अचानक कहीं चली गई। रास का उल्लास थम गया। कृष्ण व्यथित होकर जिधर दौड़े, शिव भी उधर ही चल पड़े। राधा मिलीं। गोवर्धन के प्रशांत प्रांत में। आंखों में रोष की लालिमा थी। कृष्ण का कण्ठ रुंध गया। आंखों से अश्रुधारा बह निकली। प्रिया के वरण पखारने लगी। न कुछ कहा, न सुना। केवल मानस निवेदन से ही मानिनी का मान भंग हो गया... 'इन अलभ्य मौतियों से मेरा अभिषेक मत करो कान्हा...' शिव ने देखा, जैसे उनकी जटा से गंगा सहस्त्र धार होकर बहती है, वैसे ही एक प्रेम धारा वहां भी बह निकली है। वे मोहविष्ठ से युगल छवि की ओर बढ़े और बोले... 'हे राधिके प्रेमाश्रुओं की यह धारा इस ब्रज वसुंधरा पर मानसी गंगा बनकर बहती रहेगी।' यही है रास का रस। सदा आनंद। सदा सौंदर्य। सदा सुख। सबको सुख में डुबो देने वाला सुख। 'तत्वित सुखत्व' अपना नहीं, अपने का सुख। या कहें, अपने के सुख से उपजा अपना सुख। रास के इसी सुख, इसी रस के बीच कृष्ण की मुरली से झरते हैं सुरों के पारिजात भी।

"टेर वंशी की / नदी के पार।

 कौन दूभर भार / अपने-आप 

झुक आई कदम की डार /

धरा पर बरबस हारे दो फूल"। (अज्ञेय)

रास सृजन है। वेणु सृजन का गीत है। यह गीत कृष्ण के अधरों पर जागता है। सबको जगाता है। ब्रज आनंदित है। बंसी बज रही है। राधा का नाम ले-लेकर बज रही है। इस बांसुरी का बजना ही ब्रज का सुख हो गया है। यमुना बह रही है मुरली की धुन होकर। वनों में वसंत का उल्लास छा रहा है। कृष्ण की बंसी अमृत सिंधु-सी बही जा रही है। ब्रज का कोना-कोना थिरक रहा है। डाल-डाल धमक उठी है। पात-पात मृदंग हो गया है, लेकिन अचरज ! सांवरे की बांसुरी से तीन प्राणी अछूते हैं! वृंदावन बंसी बजी, मोहे तीनों लोक, वे तीनों मोहे नहीं, रहे कौन-सी ठौर। कौन हैं वे तीन प्राणी? लोकसाहित्य कह रहा है, 'कंस, कंस की भार्या, और कंस की माय। अब सांवरे की बांसुरी इन तीनों को मोहे भी कैसे। इस मोह से जुड़ाव तो उसी का है, जिसका जुड़ाव श्याम से है। जीवन की वृंदावनी भूमि पर मुरली की धुन उन्हीं को छूती है, जो बंधे हैं प्रेम के तार से।

कृष्ण मुरली छूते हैं तो एक ही टेर फूटती है... राधा... ! जो बांसुरी तीनों लोकों को अपने मोहपाश में बांध रही है, तीनों देवों को मोह रही है, वही जानती है कि उसके स्वर किसके लिए हैं। - उसकी पुकार किसके लिए है। बांसुरी का गीत कृष्ण की परम आराधिका के लिए है, राधिका के लिए है। उस पुकार को सुन राधा भी कहां ठहर पाती है। ये बांसुरी खींच ही लेती है उसे। हां, लोकलाज का भय है पर ज्यादा बड़ा भय तो अयन के सवालों का है... राधा प्रकंपित है। क्या कहे अयन से। क्यों खिंची चली जाती है कुंजों की ओर ! कौन है वो पीतांबरधारी, जो खींच लेता है उसे मिसरीली मुरली बजाकर !! मन ही मन पुकार उठती है राधा, 'कुछ करो बंशीधर ! इस विपत्ति से बचाओ...'

'बंसी होइलो असि, बनमाल होइलो मुंडमाल...' राधा की पुकार पर कृष्ण ने अद्भुत लीला रची। कृष्ण की बंसी तलवार बन गई। वनमाल मुंडमाल हो गई... अयन को दिखाने के लिए कान्हा ने रख लिया कृष्णकाली का रूप। कौन जाने अयन का संदेह मिटा या नहीं, लेकिन राधा के लिए वृंदावन के केशीघाट पर आज भी कृष्ण मां काली का रूप धरे बैठे हैं। यूं, कृष्ण का रूप धरकर राधा ने भी तो बजाई थी बांसुरी। पीताम्बर ओढ़कर, मोरपंखा सजाकर राधा के होंठों ने बसी को छुआ। चारों दिशाएं श्रुति बन गईं... कैसी तान। ब्रह्मा, विष्णु, शिव... सब सम्मोहित !

"ताल मृदंग उपंग चंग, बीला डफ राजै

 दुदुभी, डिमडिम झालरी निल-निल मुरली बाजै"।।

सारा जग... सारी धरती बंध गई बांसुरी के सुरों से। कोई दीवार, कोई पर्वत कोई रुकावट नहीं। करील, कुंज निकुंज सबको सम्मोहन में समेटती रही। बजती रही बांसुरी। बांसुरी के सुरों में नहा उठा बज... और ब्रजनंदन... वे खिलखिलाकर हंस दिए, 'अरे राधे ! तू तो चिढ़ती थी न इस मुरलिया से!' ....ब्रज छोड़ते समय मुरलीधर ने राधा को थमा दी थी अपनी

बांसुरी... इस बांसुरी का मूल स्वर तो इस ब्रज का प्रेम है राधे, ये बांसुरी ब्रज के बाहर नहीं बज सकेगी।' जाते-जाते कृष्ण अपना रास भी वृंदावन को सौंप गए। कृष्ण का रसिक हृदय ब्रज में ही छूट गया। द्वारिकापुरी रास के रस को भला कैसे समझती। राधा के बिना कहां संभव था रास? रास के बिना कहां संभव थी राधा? रथ धूलि उड़ाता चला जा रहा था। स्नेह मेदुर दृष्टि में यमुना का भार संभाले बस देखती रही राधा। कृष्ण मौन थे। निर्वाक! आंदोलित !

योगिराज खुद न लौटे। योग की गठरिया लादकर ऊधौ को दौड़ा दिया। ऊधौ भली करी कि ब्रज आए! राधा ने दुकूल में लिपटी मुरलिया निकालकर रख दी ऊधौ के हाथों में... 'ये कान्हा की निधि है ऊधौ इसका मौन अब नहीं सहा जाता। इसे जिन न अधरों की शय्या चाहिए, इसे वहीं पहुंचा दो... 'ऊधौ चुप। डब-डब अखियां। क्या कहें। कैसे कहें। नहीं कह पाए, तेरौ तेरे न पास है, अपने माहीं टटोल। राधे! तेरा बांसुरी वाला तो ब्रज में ही छूट गया है। वो ब्रज के बाहर नहीं मिलेगा। ले भी जाऊं तो किसे दूंगा बांसुरी? द्वारिकानाथ को??? ना... उनके अधरों पर न नहीं सजेगी बांसुरी। वहां तो शंख विराजता है। शंख ही अब कृष्ण की विवशता है....

बांसुरी से शंख तक!

कृष्ण का जीवन दो छोरों से बंधा है। एक छोर पर बांसुरी है। सृजन है। आनंद है। अमृत है। रस है। रास है और भोग है। दूसरे छोर पर शंख है। युद्ध है। वेदना है। गरल है। नीरसता है। महाभारत है और योग है। एक छोर पर ब्रज है दूसरे पर कुरुक्षेत्र। बंशी और शंख दोनों होंठ पर रखकर बजते हैं। दोनों में नाभि स्वर गूंजता है, लेकिन फिर भी प्राकृत कवि 'पांचजन्य को कृष्ण की विवशता' मानता है। सवाल कृष्ण के मन में है। क्या सचमुच पांचजन्य के बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है? जीवन की भूमि पर आनंद के, प्रेम के, अपनत्व के जिस धर्म को बांसुरी रचती है क्या उससे श्रेष्ठ है रणभूमि में शंख फूंककर स्थापित किया गया धर्म? एक सुंदर दुनिया का स्वप्न क्या होना चाहिए महारास या महाभारत, वेणु या शंख...? भय है कृष्ण को। जिन होंठों से नेह की मुरली बजाई उन्हीं होंठों से कैसे बजाएंगे युद्ध का शंख? कृष्ण बचाना चाहते हैं दुनिया के होंठों पर प्रेम के गीत। बांसुरी बजती रहे, इसलिए कृष्ण शंख उठा लेते हैं। चक्र उठा लेते हैं। वक्त की पुकार पर चक्रधारी बन उद्घोष करते हैं...।

परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृतां...

कृष्णकाल था लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सत्ता के कठोर संघर्ष का काल। राजनीतिक और सांस्कृतिक हलचलों का काल। मगध-राज्य में जरासंध की शक्ति का विस्तार हो रहा था। इस पुरानी पड़ चुकी सत्ता के खिलाफ कुरु धुरी का निर्माण किया कृष्ण ने। कुरु धुरी दो टुकड़ों में बंटी थी - कौरव और पांडव। कृष्ण ने बहुत दूरदर्शी नीति का प्रयोग किया। कौरव संख्या में अधिक थे, लेकिन पांडवों में संभावनाएं अधिक थीं। इसीलिए पांडवों को अपने साथ लिया कृष्ण ने। उनकी खूब सहायता की। इंद्रप्रस्थ बसाने में। खांडव वन के अग्निकांड से बचाने में। अज्ञातवास में। महाभारत के युद्ध में और राजसूय व अश्वमेध यज्ञ में भी। अन्यायी कौरवों का समर्थन मगध की ओर चला गया। धीरे-धीरे पारिवारिक मतभेद घर से निकलकर कुरुक्षेत्र तक पहुंचा, लेकिन दुनिया जिसे कुरुवंश का आपसी कलह समझती रही, वह तैयारी थी तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को बदलने की। एकता के सृजन की। सारे देश को बांधना, जो था कृष्ण को।

कृष्ण ने छोटे-बड़े कई राजनीतिक केंद्रों को इस नवीन संगठन से जोड़ा। जोड़ने का सूत्र बने वैवाहिक संबंध। पांचाली द्रौपदी, मणिपुर की चित्रांगदा, नागजाति की उलूपी, आदिवासी कन्या हिडिंबा और यादव वंशी सुभद्रा भी। अब कुरु सत्ता को इच्छानुसार मोड़ सकते थे, फैला सकते थे कृष्ण। डॉ. लोहिया लिखते हैं, 'कृष्ण त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने देख लिया होगा कि उत्तर-पश्चिम में आगे चल कर यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे, इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र वहीं रचना चाहिए, जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर सके।' समर का आरंभ अपने ही कुटुंब से। अपने हो मातुल से। मथुरा जाकर ललकारा, फिर पछाड़ा कंस को। अकेले नहीं, कंस को उसके आठ भाइयों (न्यग्रोध, सुनाम, आनकाह, शंकु, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुतुष्टिमान) के साथ पछाड़ा। 'ततो हाहाकृर्त.... भागवत कहती है कि जरा से किशोर ने सत्ता पलट दी। उग्रसेन को पुनः राजा बना दिया!

बांसुरी छोड़कर फूंका गया यह पहला शंखनाद था, जो निरंकुश हो चली मगध सत्ता के विरुद्ध था। पहला बार कंस पर किया, क्योंकि कंस जरासंध का निकटतम संबंधी था। राजनीतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए कंस ने जरासंध की दो कन्याओं अस्ति और प्राप्ति से विवाह किया था। दरअसल, जरासंध ने काशी, कौशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, बंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रखा था। कंस की निर्भय निरंकुशता के पीछे भी इसी शक्ति का संबल था। दामाद कंस की मौत से तिलमिला उठा था मगध। यादवों की सैन्य शक्ति सीमित थी अतः कृष्ण ने जमकर प्रयोग किया। साम, दाम, दंड, भेद का। वार करो और भागो। छापामार युद्धनीति। कृष्ण ने सबको दिखाया कि क्या कुछ नहीं किया जा सकता युद्ध और प्रेम में ! जरासंध ने अठारह बार मथुरा पर चढ़ाई की। आश्चर्य ! विपुल सेना और संसाधनों के बाद भी सत्रह बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में जरासंध ने यवन जाति के मलेशियन शासक कालयवन की सहायता ली।उसे देख कृष्ण भाग लिए रणछोड़ कर। कोसों दूर द्वारिका जाकर रुके। रणछोड़... हां, सब ओर यही चर्चा हो रही थी, लेकिन कोई गोपन चर्चा तो यादव समूहों में भी हुई थी... कृष्ण ने ही कंस को मारकर जरासंध को चुनौती दी है। कृष्ण की चुनौती और महत्वाकांक्षा का दुष्परिणाम क्यों झेले मथुरा ! जरासंध का निशाना मथुरा नहीं, बल्कि कृष्ण है! आश्चर्य ! अक्रूर, उग्रसेन, विकद्रु जैसे वरिष्ठ यादव भी सहमत हैं। जिस नगर को निरंकुश कंस के भय से बचाया, वही आज अपनी रक्षा के भय से कृष्ण को बाहर का रास्ता दिखा रहा था! कृष्ण जरासंध की सेना के सामने ही दक्षिण दिशा की ओर चले गए। इतिहास वेत्ताओं का मानना है कि 3089 वि.पू. में कृष्ण बलराम ने द्वारिका प्रवास किया। संभवतः इसके बाद कृष्ण फिर कभी ब्रज न लौट सके। मथुरा की आबादी बहुत कम रह गई। बलराम ब्रज में आकर दो मास रहे। यह समय उन्होंने अपने प्रिय कृषि कार्य को दिया। प्रकृति की सेवा में दिया। दूर बहने वाली यमुना को वे अपने अथक प्रयासों से वे वृंदावन तक ले आए। पुराणों से पता चलता है, कुछ समय बाद ही कृष्ण ने पांडवों की सहायता से जरासंध का वध करा दिया।

"दिले हर कृष्ण ने अर्जुन को जीता 

वफा हर दौर में लिखती है गीता"। (साहबा अख़्तर)

कृष्ण के हाथ में अर्जुन के रथ की वल्गाएं (रस्सियां) हैं, लेकिन वास्तव में तो इस समूचे युद्ध की वल्गा को ही थामा उन्होंने। संधि का प्रयल निष्फल रहा। युद्ध अनिवार्य हो गया। बांसुरी से काम न बना तो शंख उठाना ही था। एक तरफ मांग मात्र पांच गांव की, दूसरी ओर बिना युद्ध सुई की नोक बराबर भी जमीन न देने का हठ। महाभारत की पृष्ठभूमि में क्या था, शकुनि की चाल या जुए की लत? पांचाली का प्रतिशोध या दुर्योधन का वैमनस्य? बेशक दोनों हों।कुरुक्षेत्र में शंख गूंज उठा। मत्स्य, पंचाल, वेदि, कारूश, पश्चिमी मगध, काशी और कंशल, सौराष्ट्र-गुजरात के वृष्णि यादव पांडवों की ओर। श्रसेन, महिष्मती, अवति, विदर्भ और निषद देश के यादव तथा बंगाल, असम, उड़ीसा वत्स देश कौरवों की ओर। पांडवों के पास सात अक्षौहिणी और कौरवों के पास ग्यारह अक्षौहिणी सेना। सेनाएं आमने-सामने हैं। अर्जुन व्यथित हैं। गांडीव नहीं उठाया जाता। कैसे उठाएं, सामने गुरुजन हैं। अपने कुटुंबी हैं। अपनों के लिए गांडीव कैसे उठे। कृष्ण समझाते हैं, गांडीव युद्धभूमि की जरूरत है। योद्धा का धर्म है ,भय न करो। मोह न पालो। कर्म करो और फल की फिक्र जाने दो.... महारास में ही नहीं, महाभारत में भी गीत गाया कृष्ण ने। कुरुक्षेत्र में निष्काम कर्म का गीत निःसरत हुआ गीता बनकर। ठीक अठारहवें दिन कुरुक्षेत्र शांत हुआ। परिणाम... कौरवों के लिए विनाश, पांडवों के लिए विजय और कृष्ण के लिए गांधारी का शाप... नहीं... शाप नहीं। मां भी कहीं शाप देती है। ये तो मुक्ति का आशीष है....


'पशुवत मरेगा तू अकेला, अवश, असहाय और पीड़ित... पांडवों का अश्वमेध यज्ञ अंतिम हस्तिनापुर यात्रा थी कृष्ण की। रक्तपात के मंजर और मौत के वीभत्स सन्नाटों के बीच एक प्रश्न अनवरत गूंज रहा है, युद्ध में धर्म जीता है, लेकिन क्या अधर्म का नाश हो गया है? कहां है इस प्रश्न का उत्तर? किसके पास है? कृष्ण भी मौन हैं। मौन होकर सब देख रहे हैं। कुछ कहें भी तो किससे? महाभारत के बाद राजसभा में आना कम कर दिया है बुजुर्ग यादवों ने। बलराम उद्यानों और मदिरा में समय बिताते हैं। सभाखण्ड में नजर आती है दंभी, क्रोधी, अनुभवहीन युवाओं की भीड़। देह अवसान की ओर अग्रसर है कृष्ण।

संपूर्ण आर्यावर्त को अपनी प्रतिभा के चाबुक से हांकने वाले इस ग्वाले को जाने क्यों बांसुरी रह-रह याद आती है, लेकिन यहां बासुरी कहां । मथुरा से द्वारिका तक कहीं बांसुरी नहीं बजी। वहां तो सिर्फ युद्ध, संधि और शंख के स्वर हैं। सत्ता की उठापटक है। राजनीति के, जोड़-तोड़ हैं। दंभ का गर्जन है। एक अशेष विरक्ति है। रीतेपन के भयावह खंडहर हैं। द्वारिका में तो कोई कुटिल शकुनि भी नहीं है, फिर भी सारा कुल वैमनस्य, ईर्षा और विरोध से जूझ रहा है। किसी निराश और हताश वृद्ध की भांति अपनी वेदना नारद से व्यक्त करते हैं कृष्ण। नारद कहते हैं, 'युद्ध को सिर्फ युद्ध से ही रोका जा सकता है या फिर कोमल शस्त्र से। सदा प्रेम, मधु वचन, आदरभाव, दान और क्षमा... यहीं है बिना लोहे का शस्त्र !'

क्या यहीं संकेत नहीं है नारद का... या तो शंख, नहीं तो बांसुरी...! पर अब शंख उठाने की न इच्छा है, न सामर्थ्य और न संसाधन। रही बांसुरी तो उसके सुरों को भी ये डूबते हुए लोग कैसे सुनेंगे। किसी पर बल का नशा है, किसी पर सौंदर्य का और सभी पर मदिरा का... उसी में डूबकर तो ये लोग डुबो रहे हैं द्वारिका को। प्रभास क्षेत्र में उगी 'एरका' (सरकंडा) नामक घास यादवों का शस्त्र बन गई है। महासत्ता बनकर उभरा यदुकुल भीषण गृह युद्ध से जूझ रहा है। स्त्रियां जल कर प्राण दे रही हैं। बलराम दुखी होकर समुद्र की ओर चले गए और वहां से फिर उनका पता नहीं चला। पुराणों में जिक्र है कि हिरण्य, कपिला और सरस्वती के संगम पर समाधि ले ली थी उन्होंने। एक मानव को विशाल नाग बनकर सागर में उतरते देखा गया। कृष्ण मर्माहत हैं। एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात कर रहे स्वजनों को देख विषाद का महासागर उमड़ रहा है। उग्रसेन की तलवार अक्रूर पर खिंची है। सांब की गदा सुचारु को खोज रही है। सात्यकि और कृतवर्मा के लहूलुहान शव धरती पर पड़े हैं। जूठे बर्तन लिए नशे से लड़खड़ाते यादव प्रद्युम्न की देह उमेठ रहे हैं। गिद्धों का आनंद हृदय चीर रहा है। समुद्र की लहरें आने वाले ज्वार की सूचना दे रही हैं। कृष्ण दौड़कर 'विरज' की ओर जाते हैं... नहीं यह राधा का 'बिरज' नहीं, द्वारिका के महल में बना उनका निजी कक्ष है। अनुभूतियों में बसे ब्रज का रस कहां है, इस ऐश्वर्य से लक-दक करते कक्ष में। कृष्ण की आत्मा में मुरली की प्यास जागी है... एक बार जन्माष्टमी पर रुक्मिणी ने इसी 'विरज' में लाकर भेंट की थी उन्हें एक मुरली। हीरे मोती जड़ी सोने की मुरली। शायद रुक्मिणी की भेंट इस प्यास को बुझा पाए! कृष्ण ने मुरली होंठों पर रखी... पांचजन्य का रुदन गूंजने लगा सब ओर...

अश्वत्थ (पीपल) पर आंखें मूंदे लेटे हैं कृष्ण। बाहर जो हो रहा है, उसे नहीं देखना चाहते या जो भीतर है, उसे देख रहे हैं। मन ही मन कोई संवाद चल रहा है... सांसों का व्यापार छूट रहा था। रणछोड़ व्यथित। बेचैन। एक इच्छा जागी है। जाते-जाते एक बार मिलना चाहते हैं वंशीधर से। अंखियां आकुल हैं। कहां मिलेगा रास रचैया, बंसी बजैया। कहां होगा वो? द्वारिका के अकूत वैभव में। कुरुक्षेत्र की गीता में !! सत्ता के भव्य सिंहासन में!!! मुरलीधर तो केवल एक ही जगह मिलेगा... राधा के हृदय में। राधा का हृदय तो ब्रज है... क्या रणछोड़ वहां जा सकेगा? तो क्या राधा को ही आना होगा। मेघों से भरी अंधियारी रात में भी तो आई थी राधा। अब भी आएगी, लेकिन इस पांचजन्य में वो सामर्थ्य कहां, जो राधा को खींच ले!

अचानक दाहिने तलुवे में एरक (सरकंडे) जैसा नुकीला एहसास हुआ। 'क्षमा करें द्वारिकानाथ मैंने तो वनचर समझकर...' जरा पारधी के कांपते स्वर सुन एक शांत स्मित होंठों पर उभरा... 'ये तीर तो तुम्हारा कर्म है जरा पारधी। कर्म में भय कैसा ! क्षमा कैसी ! शोक कैसा ! लेकिन कृष्ण कहते हैं- अच्छा हुआ, जो तुम्हारा तीर पैर पर ही लगा...' हां... अच्छा हुआ हृदय पर न लगा। वहां राधा थी। ब्रज था। बंशीवट था। करील कुंजें थीं। कालिंदी थी। मोर थे। गाएं थी। हरित सौंदर्य से मंडित वृक्ष थे, लताएं थी... पैर से उष्ण रुधिर बहता था पर जाने क्यों कालिंदी की कल-कल मानस पर छा गई। द्वारिका में कालिंदी !!! चौंक उठे थे कृष्ण। प्रेम के मधु में नहाई हवा... हवा में आनंद का संपुट... और एक धुन !!! आह... यह धुन तो राधा ने बजाई थी! राधा...!!! कृष्ण के होंठों से झरा शब्द हवा में घुल गया। लगा, जैसे नीला परिधान पहने, गोरे मुख पर काली चुनरिया का घूंघट खींचे अपनी ही पायल की धुन पर तैरती हुई-सी एक स्वप्न छाया चली आ रही है... 'ये बांस का टुकड़ा नहीं कान्हा, बांसुरी है। प्राणों से जब -फूंकी जाती है तो सृजन का गीत मुखर होता है...।'

कहीं से एक स्वर गूंजता हुआ कृष्ण को खींच रहा है... 'मामेकं शरणं ब्रजः, मामेकं शरणं ब्रजः, मामेकं शरणं ब्रजः...' आनंद... आनंद... राधे-राधे।। *।                                                                                       साभार 


- अनुपमा 'ऋतु'

                          स्वतंत्र पत्रकार तथा कथाकार                                            मथुरा (उत्तर प्रदेश) में निवास।                                           (लेखिका की अनुमति से प्रकाशित)

संदर्भ : भगवती प्रसाद सिंह संपादित भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण। भवानी शंकर शुक्ल और हरिमोहन मालवीय द्वारा संपादित भारत भावरूप श्रीकृष्ण। राय चौधरी - अली हिस्ट्री ऑफ वैष्णव सेक्ट। दिनकर, जोशी द्वारिका का सूर्यास्त। काजल ओझ वैद्य - कृष्णायन। आर. जी. भंडारकार - ग्रंथमाला। विंटरनीज - हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर। मैकडॉनल तथा कीथ- वैदिक इंडेक्स। ग्रियर्सन - एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजंस। भगवानदास कृष्ण, तदपत्रिकर- दि कृष्ण प्रायलम। दामोदर धर्मानंद कोसंबी प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता। के. एम. मुंशी - ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश। वासुदेवशरण अग्रवाल - इंडिया ऐज नोन दु पाणिनि। दिनेश सरकार- सिलेक्ट इंसक्रिपशंस। दिनेशचंद सरकार एनुअल रिपोर्ट, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया। प्रिय तोष बनर्जी - द लाइफ ऑफ कृष्ण इन इंडियन आर्ट। पुराण साहित्य एवं महाभारत।

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