इतिहास बन गई तख्ती........
पंद्रह-बीस साल पहले स्कूलों में बच्चे सरकंडे से बनी कलम और दवात की सहायता से लकड़ी से बनी तख्ती पर वर्णाक्षरी सीखते थे। स्कूल में उन दिनों तख्ती लिखना नियमित दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। दरअसल तख्ती लिखना तब पठन-पाठन का एक बेहद आसान और सरल तरीका माना जाता था। क्योंकि पाठ्यक्रम का अधिकांश हिस्सा विद्यार्थियों को पढ़कर तथा तख्ती पर लिखकर ही कंठस्थ हो जाता था।
विद्यार्थी स्कूल में अपने सहपाठियों के साथ बैठकर समूह में तख्ती लिखने का कार्य करते थे। इससे पाठ्यक्रम पर उनकी मजबूत पकड़ बन जाती थी। धीरे-धीरे स्कूलों में तख्ती लिखने का प्रचलन कम होता गया तथा एकाएक स्कूलों से तख्ती बिल्कुल ही गायब हो गई। तेजी से बदलते परिवेश में बहुत पीछे छूट गई तख्ती और दवात की जुगलबंदी। अब लकड़ी की तख्ती तथा स्याही की दवात अतीत की स्मृतियों में पूर्णतः दफन हो चुकी हैं। मुल्तानी मिट्टी से लिपी-पुती तख्ती उस जमाने में स्कूल की मुख्य पहचान मानी जाती थी।
तब तख्ती लिखना पांचवीं कक्षा तक अनिवार्य भी था। असल में तब तख्ती लिखना लिखाई सुधार का बेहतरीन विकल्प समझा जाता था। तख्ती लिखने से पहले उसे मुल्तानी मिट्टी से अच्छी तरह लीपा-पोता जाता था। फिर पेंसिल की सहायता से अध्यापक द्वारा निर्धारित किए गए विषय को सुंदर ढंग से तख्ती पर लिखा जाता था।उसके बाद सरकंडे से बनी कलम और दवात की सहायता से पेंसिल से लिखे गए अक्षरों के ऊपर पुनः लिखाई की जाती थी।सरकंडे की कलम को स्याही की दवात में डुबाकर तख्ती पर एक एक अक्षर सावधानी से लिखा जाता था।कलम द्वारा काली स्याही से लिखे अक्षर अत्यंत आकर्षक लगते थे।
तख्ती लिखते समय कोई त्रुटि न हो और लिखाई साफ एवं सुंदर बनी रहे इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था। आधुनिकता की चकाचौंध में तख्ती और दवात की जुगलबंदी निरंतर फीकी पड़ती चली गयी। बदलाव की इस बयार में अध्यापकों को भी बच्चों से तख्ती लिखवाना नागवार लगने लगा। अध्यापकों की बेरुखी की वजह से तख्ती लेखन से बच्चों की रुचि भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगी और उन्हें तख्ती लिखना नीरस लगने लगा। अध्यापकों के ढुलमुल रवैये और बच्चों की अभिरुचि क्षीण होने से जल्दी ही तख्ती स्कूलों से नदारद हो गयी।इस तरह स्कूलों में कालांतर से चली आ रही इस बेहद सफल पठन- पाठन की प्रणाली ने दम तोड़ दिया। अध्यापकों ने यह दोष अपने सिर पर नहीं मढ़ने दिया। उन्होंने आधुनिकता के चलते शिक्षा प्रणाली में आये व्यापक बदलावों और नवीनतम शिक्षा को भविष्य की जरूरत बताकर तख्ती लिखवाने से अपना पल्ला झाड़ लिया। सरकारी तंत्र की उदासीनता और शिक्षा विभाग की अनदेखी के चलते तख्ती हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों की गहराई में दफन हो गयी। बहरहाल दोष किसी का भी हो लेकिन तख्ती आगामी पीढ़ियों के लिए अतीत की स्मृतियों में बसी एक भूली-बिसरी दास्तां बनकर रह जायेगी।
नसीब सभ्रवाल"अक्की" गांव-बांध, पानीपत, हरियाणा132107 मो.न.-9716000302



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