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अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इंजीनियर गुरु ........................

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  इंजीनियर गुरु   ........................ बा त कुछ 17  साल पहले की है। मैं मुंबई में रहकर क्राफ्ट इंस्ट्रक्टर का कोर्स कर रहा था। पढ़ाई के दौरान मुझे अपनी कक्षा के सभी छात्रों के साथ समुद्री जहाज बनाने के प्रसिद्ध सरकारी उपक्रम मांझगांव डॉकयार्ड में जाकर कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां कार्यरत एक वरिष्ठ इंजीनियर हमारा मार्गदर्शन करते हुए कंपनी की प्रत्येक गतिविधि से हमें अवगत करा रहे थे। उन्होंने हमें बताया कि कंपनी में शिवालिक, सहयाद्रि और सतपुड़ा नाम के तीन बड़े युद्धपोत बनाने का कार्य तेजी से चल रहा है। इसके अतिरिक्त वहां कई पनडुब्बियां बनाई जा रही थी। जब वह वरिष्ठ इंजीनियर उस संस्थान की उपलब्धियों का बखान कर रहे थे, तब मेरा ध्यान कहीं ओर ही था। दरअसल, उस वक्त मेरा चयन दुबई की एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर हो चुका था। वहां जाने के लिए मेरा वीजा भी जल्दी ही लगने वाला था, जिसको लेकर मैं खासा उत्साहित था। मुझे कहीं और ध्यानमग्न देखकर कंपनी के इंजीनियर और उस वक्त हमारे मार्गदर्शक ने मुझे बीच में ही टोक दिया। उनके टोकते ही मैं कल्पना लोक से सीधा यथार्थ की ...

वध (कहानी)

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विजय दशमी के दिन शहर में भीड़ का कोई पारावार नहीं था। शाम होते-होते लोग अपने घरों को छोड़कर शहर के बीचोंबीच स्थित उस खाली मैदान की राह पकड़ चुके थे जहां रावण दहन होना था। शहर के मध्य बने इस मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के अट्हास करते बड़े-बड़े पुतले बनाए गए थे। मैदान में लोगों की भीड़ निरंतर बढ़ती ही जा रही थी। सुरेश भी मन में रावण दहन देखने की जिज्ञासा लिए उसी ओर चला जा रहा था। उसके कदम उस वक्त वहीं के वहीं ठहर गए जब उसने देखा कि भीड़ का एक काफिला चोर-चोर चिल्लाते हुए एक युवक का पीछा कर रहा है । सुरेश को समझते तनिक भी देर नहीं लगी कि वह व्यक्ति कोई जेबतराश था । जिसने भीड़ का फायदा उठाकर किसी की जेब काट ली थी। भागते-भागते जेबतराश ने डर के मारे चुराया हुआ बटुआ पीछे ही फेंक दिया था। तब अंधेरे की वजह से लोगों की नज़र उस बटुए पर नहीं पड़  थी और लोगों का वह हुजूम दूर तक उस जेबतराश का पीछा करता रहा। लोगों की भीड़ छंटने पर जब सुरेश ने वह बटुआ उठाकर देखा तो उसमें हजारों रुपयों की नकदी थी। बटुआ पाकर उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं। इतने रुपये तो एक साथ उसने अपने पूरे जीवनकाल में कभी नहीं दे...

देस परदेस (कहानी)

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  परदेस जाकर पैसा कमाने की चाह तो अविनाश के मन में शुरू से थी,।मगर उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका यह सपना इतनी जल्दी पूरा हो जायेगा। परदेस जाने के लिए उसने एजेंट को अपनी सारी जमा पूंजी सौंप दी थी। उसे तीन साल का वर्क वीजा मिला था। अविनाश की मां ने कितने सपने देखे थे उसकी शादी-ब्याह के, मगर उसने हमेशा की तरह इस बार भी अपनी मां को यह कहकर समझा दिया था • ' -मां परदेस से आते ही तू जिस लड़की से कहेगी मैं उसी से आंख मूंदकर ब्याह कर लूंगा।' अपने शब्दों के बुने जाल में फांस तब मां का दिल रखने के लिए अविनाश ने कह दिया था '-मां जल्दी लौट आऊंगा।' मगर तब कहां महसूस कर पाया था वह अपनी मां की आंखों में उद्वेलित हो रहे स्नेह के तूफान को। परदेस जाने की उमंग में तब कितनी जल्दी रौंद आया था वह ममता का अविरल सैलाब। चलते वक्त मां ने कहा था, 'बेटा रेल की यात्राएं और अतीत की स्मृतियां इतनी जल्दी पीछा नहीं छोड़तीं।' तब मां की बात को अनसुना कर दिया था उसने । चतुराई से झुठला दिया था उसका जीवन पर्यन्त अनुभव। परदेस आकर अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ न होने के कारण कई बार उसे फजीहत ...