देस परदेस (कहानी)
परदेस जाकर पैसा कमाने की चाह तो अविनाश के मन में शुरू से थी,।मगर उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका यह सपना इतनी जल्दी पूरा हो जायेगा। परदेस जाने के लिए उसने एजेंट को अपनी सारी जमा पूंजी सौंप दी थी। उसे तीन साल का वर्क वीजा मिला था। अविनाश की मां ने कितने सपने देखे थे उसकी शादी-ब्याह के, मगर उसने हमेशा की तरह इस बार भी अपनी मां को यह कहकर समझा दिया था • ' -मां परदेस से आते ही तू जिस लड़की से कहेगी मैं उसी से आंख मूंदकर ब्याह कर लूंगा।' अपने शब्दों के बुने जाल में फांस तब मां का दिल रखने के लिए अविनाश ने कह दिया था '-मां जल्दी लौट आऊंगा।' मगर तब कहां महसूस कर पाया था वह अपनी मां की आंखों में उद्वेलित हो रहे स्नेह के तूफान को। परदेस जाने की उमंग में तब कितनी जल्दी रौंद आया था वह ममता का अविरल सैलाब। चलते वक्त मां ने कहा था, 'बेटा रेल की यात्राएं और अतीत की स्मृतियां इतनी जल्दी पीछा नहीं छोड़तीं।' तब मां की बात को अनसुना कर दिया था उसने । चतुराई से झुठला दिया था उसका जीवन पर्यन्त अनुभव। परदेस आकर अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ न होने के कारण कई बार उसे फजीहत भी सहनी पड़ी थी। अंग्रेजी में तो वह शुरू से ही कमज़ोर था । परदेस आये उसे एक अरसा बीत चुका था। उसने तो अपना देश कब का छोड़ दिया था, पर वह जानता था कि उसका देश अब तक उसे अपनी गिरफ्त में जकड़े हुए है। कभी- कभी उसे मां की कही बात याद आ जाती तो अनायास ही उसके होंठों पर हंसी तैर जाती। उसका बदन सर्दी से कांप रहा था। कई दिनों से उसे तेज बुखार था। पीड़ा से कराहती उसकी आंखों से आंसू सावन- भादों बनकर बरस पड़े। पर यहां परदेस में उसकी सुध लेने वाला कौन था? गांव में बीमार होने पर तो मां जाने कितनी ही रातें उसके सिरहाने बैठकर काट देती थी। जब दवाओं से आराम नहीं मिलता तो बुरी नज़र मानकर जाने कितने ढोंगी बाबाओं के दिये ताबीज़ - भभूत जबरन ही गले में बांध देती थी। मगर सात समन्दर पार इस परदेस में मां नहीं थी और न ही यहां कोई ऐसा था जिससे वह अपने दिल की बात कह पाता। यहां ऐसा उसका अपना कोई सगा नहीं था जिससे वह हास-परिहास में बीते बचपन की अठखेलियों, शरारतों के खट्टे-मीठे अनुभव साझे कर पाता। कई बार एकांत में स्मृतियां उस पर हावी हो जातीं। पीले फूलों की चादर में लिपटे सरसों के खेत... गन्ने की मिठास... हवा से सीधा संवाद करती विशाल दरख्तों की शाखाएं... | अकसर उसे खींच लाती सरहदों के पार अपनी ज़मीन पर । फिर सरहदों के बस में भी कहां है मन की कल्पित उड़ान को रोक पाना। अगर उसके बस में होता तो वह कब का पाट देता सरहदों के बीच की यह दूरी ।
परदेस में हवा से गुफ्तगू करती गगनचुम्बी इमारतों में जीवन को सुलभ बनाने वाले ऐश्वर्य के तमाम संसाधन उपलब्ध थे, मगर यहां आकर उसे प्रेम की अनुभूति आज तक महसूस नहीं हो पायी थी। गाजर का हलवा और सरसों का साग उसे बहुत पसंद थे। परदेस में भी मां के हाथों का बना गाजर का हलवा और सरसों का साग याद आते ही उसके मुंह में पानी भर आता । कभी-कभी तो अतीत की मधुर स्मृतियों से ही उसकी क्षुधा शांत हो जाती। उसे अपने गांव के सभी लोगों के नाम जुबानी याद थे। अलबत्ता उसके गांव के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख के साझीदार थे। अच्छे-बुरे समय में डटकर एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे, पर यहां परदेस में बगल वाले फ्लैट में कौन रहता है, अविनाश बरसों यहां रहने के बाद भी नहीं जान सका था। कल-परसों की बात थी जब बीच के माले पर एक फ्लैट में चोर घुस आये थे। चोर आसानी से लाखों की नकदी उड़ा ले गये थे, वह भी दिनदहाड़े और किसी ने उफ् तक नहीं की थी। सब तमाशबीनों की तरह बस तमाशा देखते रह गये थे । बिस्तर पर लेटे-लेटे फिर एक दृष्टांत उसकी स्मृतियों में घुल आया था 'जब हीरा काका के घर चोर घुसे थे, तब कैसे सबने मिलकर खबर ली थी उनकी। पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। जान पर बन आयी थी बेचारों की।' पर उसके गांव जैसा प्रेम और सामंजस्य कहां था इस परदेस में? लाखों लोगों के बीच रहकर भी वह स्वयं को हमेशा अकेला ही पाता था। सब कुछ होते हुए भी कुछ ऐसी कमी थी जिसे वह चाहकर भी नहीं भर सकता था। मुख पर आती-जाती दर्द की रेखाओं से कराह उठा था अविनाश । उसने दर्द से कराहते हुए ज्यों ही करवट बदली अनायास ही उसके अधरों से प्रस्फुटित "मां" संबोधन ने कमरे में व्याप्त चुप्पी को झकझोरकर रख दिया। परदेस में -"मां"... चौंक उठा था अविनाश। वह जानता था कि वह सिर्फ उसका भ्रम है, पर जाने क्यों उसे लगा जैसे उसकी मां अपने हाथों के कोमल स्पर्श से उसके मस्तक को दुलार रही है। उसके हाथों का जादुई स्पर्श पाते ही उसके चेहरे पर नृत्य कर रही पीड़ा की तमाम रेखाएं शिथिल पड़ती जा रही हैं। स्मृतियां फिर उसकी आंखों में उतर आयी थीं । उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें मूंद लीं। वह चुपचाप स्मृतियों के अथाह सागर में उतरता चला गया। पीले फूलों की चादर में लिपटे सरसों के खेत... गन्ने की मिठास... हवा से संवाद करती विशाल दरख्तों की शाखाएं...। मां के हाथों का बना गाजर का हलवा... सरसों का साग... फिर खींच लायी जीवन की मधुर स्मृतियां उसे सरहदों के पार । अपने देश... अपने लोगों के बीच ।
-गांव व डाकघर बांध,
पानीपत- 132107
Mo. 9716000302


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