इंजीनियर गुरु ........................

 इंजीनियर गुरु ........................

बात कुछ 17  साल पहले की है। मैं मुंबई में रहकर क्राफ्ट इंस्ट्रक्टर का कोर्स कर रहा था। पढ़ाई के दौरान मुझे अपनी कक्षा के सभी छात्रों के साथ समुद्री जहाज बनाने के प्रसिद्ध सरकारी उपक्रम मांझगांव डॉकयार्ड में जाकर कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां कार्यरत एक वरिष्ठ इंजीनियर हमारा मार्गदर्शन करते हुए कंपनी की प्रत्येक गतिविधि से हमें अवगत करा रहे थे। उन्होंने हमें बताया कि कंपनी में शिवालिक, सहयाद्रि और सतपुड़ा नाम के तीन बड़े युद्धपोत बनाने का कार्य तेजी से चल रहा है। इसके अतिरिक्त वहां कई पनडुब्बियां बनाई जा रही थी।

जब वह वरिष्ठ इंजीनियर उस संस्थान की उपलब्धियों का बखान कर रहे थे, तब मेरा ध्यान कहीं ओर ही था। दरअसल, उस वक्त मेरा चयन दुबई की एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर हो चुका था। वहां जाने के लिए मेरा वीजा भी जल्दी ही लगने वाला था, जिसको लेकर मैं खासा उत्साहित था। मुझे कहीं और ध्यानमग्न देखकर कंपनी के इंजीनियर और उस वक्त हमारे मार्गदर्शक ने मुझे बीच में ही टोक दिया। उनके टोकते ही मैं कल्पना लोक से सीधा यथार्थ की  जमीन पर आ गिरा। उन्होंने मुझ पर अपना गुस्सा निकालते हुए कहा, -"आपके लिए तो यह एक नाटक चल रहा होगा" ?


नहीं सर ! आपको कुछ गलतफहमी हो गई है। ' दोस्तों के सामने अपनी फजीहत से बचने के लिए घबराहट में मैंने जल्दी से अपना बचाव किया। मगर इंजीनियर साहब मुझसे संतुष्ट नहीं हुए। वे समझ गए थे कि क्या बात है। वह गंभीर होकर फिर से मुझ पर बरस पड़े। उन्होंने उन नवनिर्मित जहाजों की ओर इशारा करते हुए कहा, 'बेटा, इन्हें बनाने में हमारे साथियों ने अपनी सारी उम्र लगा दी, तब कहीं जाकर हम यहां तक पहुंचे हैं। बरसों पहले जब हम यहां आए थे, उस वक्त भी दूसरे मुल्क हमें लाखों डॉलर के पैकेज देने के लिए तैयार थे, परंतु अपने देश के लिए हमने यहां कुछ हजार रुपये की पगार पर ही बरसों गुजार दिए।
' बात करते- करते उस प्रौढ़ उम्र के इंजीनियर की आंखों में मुझे इत्मीनान और आत्मविश्वास के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बताया कि हमारे डॉक्टर, वैज्ञानिक व इंजीनियर भारत से बड़ी- बड़ी डिग्रियां हासिल करके विदेश निकल जाते हैं। जीवन भर विदेश में काम करके भारत लौटते हैं तो कितनी आसानी से कह देते हैं-भारत आज भी वैसा ही है, जैसा बीस साल पहले था। इतने सालों में यहां कोई बदलाव नहीं आया। कोई तरक्की नहीं हुई। जबकि हम यह कभी नहीं सोचते कि हमने देश के लिए क्या किया है ?
इंजीनियर की बातों का मेरे मस्तिष्क पर गहरा असर हो चला था। उन्होंने कहा, 'भारत आपसे और हमसे मिलकर ही बनता है। इसकी तरक्की के लिए भी एक-एक आदमी का सहयोग अपेक्षित है। दूसरे मुल्क हमारी प्रतिभाओं को ऊंची कीमत पर खरीद लेते हैं और उन्हीं के बूते वे तरक्की के पायदान चढ़ते जा रहे हैं। जबकि हम उनसे पिछड़ जाते हैं।' उस प्रौढ़ इंजीनियर के निश्छल देशप्रेम ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था। मुझे लगा कि जब ये कम तनख्वाह पाकर भी देश के लिए इतना कुछ कर रहे हैं, तो क्या मैं...? उनकी बातें सुनकर मेरी आत्मा ग्लानि से भर उठी। मेरे अंदर भी देश प्रेम की भावना दम भरने लगी।
मैंने उसी वक्त विदेश न जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया। उस इंजीनियर की देशभक्ति से ओत-प्रोत बातों ने मेरे अंदर भी देश के प्रति कर्त्तव्यबोध का जागरण कर दिया था। तब से लेकर आज तक मैं एक शिक्षक के पद पर कार्य कर रहा हूं और अपने देश के विकास में थोड़ा किंतु महत्वपूर्ण योगदान देकर उसकी तरक्की में भागीदार बन रहा हूं।



नसीब सभ्रवाल 'अकी'
पानीपत (हरियाणा)
Phone No. 97160 00302


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