वध (कहानी)
विजय दशमी के दिन शहर में भीड़ का कोई पारावार नहीं था। शाम होते-होते लोग अपने घरों को छोड़कर शहर के बीचोंबीच स्थित उस खाली मैदान की राह पकड़ चुके थे जहां रावण दहन होना था। शहर के मध्य बने इस मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के अट्हास करते बड़े-बड़े पुतले बनाए गए थे। मैदान में लोगों की भीड़ निरंतर बढ़ती ही जा रही थी। सुरेश भी मन में रावण दहन देखने की जिज्ञासा लिए उसी ओर चला जा रहा था। उसके कदम उस वक्त वहीं के वहीं ठहर गए जब उसने देखा कि भीड़ का एक काफिला चोर-चोर चिल्लाते हुए एक युवक का पीछा कर रहा है । सुरेश को समझते तनिक भी देर नहीं लगी कि वह व्यक्ति कोई जेबतराश था । जिसने भीड़ का फायदा उठाकर किसी की जेब काट ली थी। भागते-भागते जेबतराश ने डर के मारे चुराया हुआ बटुआ पीछे ही फेंक दिया था। तब अंधेरे की वजह से लोगों की नज़र उस बटुए पर नहीं पड़ थी और लोगों का वह हुजूम दूर तक उस जेबतराश का पीछा करता रहा। लोगों की भीड़ छंटने पर जब सुरेश ने वह बटुआ उठाकर देखा तो उसमें हजारों रुपयों की नकदी थी। बटुआ पाकर उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं। इतने रुपये तो एक साथ उसने अपने पूरे जीवनकाल में कभी नहीं देखे थे। इन रुपयों से उसके जीवन की अधिकांश समस्याएं हल हो सकती थीं। उसके जीवन में ऐसी अनेक अनसुलझी गुत्थियां थीं, जो पैसे के बूते बड़ी आसानी से सुलझ सकती थीं। मसलन बीमार मां की आंखों का आपरेशन व छोटे भाई की पढ़ाई, जो पैसे की कमी के कारण ही कब की रुकी पड़ी थी। बटुए में मौजूद धनराशि इन कार्यों के लिए पर्याप्त थी। उसे अपने सारे अधूरे ख्वाब पूरे होते नज़र आ रहे थे। स्वयं पर हुई ईश्वर की इस अनुकंपा के लिए वह बार-बार उनमुक्त हृदय से ईश्वर और उस जेबतराश का आभार जता रहा था,जिसकी वजह से हजारों रुपये की नगदी उसके हाथ लगी थी। प्रसन्नता से सरोबार सुरेश के कदम उसे जल्दी-जल्दी उसी मैदान में ले गए जहां रावण का दहन होना था। उसने बटुए को हिफाजत से अपनी जेब में छिपा लिया था। कुछ ही देर में राम का भेष धरे युवक ने जब अट्हास करते रावण के पुतले पर अग्निबाण चलाए तो वह धू-धू करके जल उठा। सुरेश दूर खड़ा रावण के पुतले को जलता देख रहा था। लेकिन कुछ वैसी ही तपिश वह अपने अंतर्मन के भीतर भी महसूस कर रहा था।
रावण ,कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों को पटाखों से निकली चिंगारियों ने ध्वस्त कर दिया था। उसका अंतस हजारों रुपये पाकर व इतनी आतिशबाजी देखकर हर्षित हो उठा था। मगर उसकी यह खुशी क्षणभंगुर ही थी। उसके मन में बार-बार उठ रहे एक प्रश्न ने उसे दुविधा की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया था। उसे लगा कि हो सकता है शायद! इन रुपयों से मेरी अधिकांश समस्याएं हल हो जाएं ? लेकिन उस व्यक्ति की व्यथा इस वक्त कैसी होगी ? जिसके वास्तव में ये रुपये हैं।
इस ख्याल की तीव्रता ने ही उसे बेचैनी की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। रावण दहन के बाद उसे लगा मानो रावण अब उसकी अपनी देह में प्रविष्ट होकर अट्हास कर रहा हो। उसे लगा जैसे वह कह रहा हो, 'सिर्फ मेरे पुतले जलाने भर से तुम मेरे अस्तित्व को नहीं मिटा सकते।' मैं तो अब भी तुम्हारे अंतर्मन में जीवित हूं। इस ख्याल के मन में आते ही वह स्वयं को किसी अपराध-बोध से ग्रस्त महसूस करने लगा। उसके खिलखिलाते अधरों पर मौन का ताला जड़ चुका था। उसका हृदय ग्लानि से भर आया। उसके अंतर्मन में प्रायश्चित की अग्नि धधक उठी। जिसकी लपटों ने उसके अंदर के रावण को जलाकर भस्म कर दिया था। पुतले जलने के बाद लोग राख के ढेर से रावण की अस्थियां चुन रहे थे। जबकि उसके अंतस में विचारों का द्वंद्व अब भी जारी था। सुरेश ने बटुए के मालिक को दसों दिशाओं में खोजा, लेकिन वह कहीं नहीं दिखा। वह उसे खोजता हुआ उसी ओर बढ़ गया जहां वह लोगों का काफिला उस जेबतराश के पीछे-पीछे गया था। अब तक उसके मन में चला आ रहा विचारों का द्वंद्व थम चुका था। वह बटुआ लौटाने का साहसिक निर्णय ले चुका था। उसे इस बात की खुशी थी कि उसने स्वयं के भीतर छिपे रावण का वध करके उस पर विजय पा ली थी।
-गांव व डाकघर बांध,
पानीपत- 132107
Mo. 9716000302


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